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YouTube से आइडिया, JCB पर कमाल! नालंदा के राजेश ने बना दी पेड़ बचाने वाली मशीन

नालंदा/सिटी हलचल न्यूज़ 

नालंदा के नूरसराय से निकली देसी तकनीक की देशभर में चर्चा, 2 से 2.5 टन तक के बड़े पेड़ों को जड़ और मिट्टी समेत दूसरी जगह करते है शिफ्ट  विकास के लिए सड़क चौड़ीकरण हो या भवन निर्माण, अक्सर निर्माण स्थल पर खड़े पेड़ों के सामने सबसे आसान रास्ता उन्हें काट देना माना जाता है। लेकिन अगर पेड़ को काटने के बजाय उसकी जड़ों और मिट्टी समेत दूसरी जगह पहुंचा दिया जाए तो? बिहार के नालंदा में एक कारीगर ने इसी सोच को मशीन का रूप दे दिया है।नूरसराय निवासी राजेश विश्वकर्मा ने ऐसी Tree Shifting Machine तैयार की है, जो बड़े पेड़ों को जड़ समेत एक जगह से दूसरी जगह प्रतिरोपित करने में मदद करती है। खास बात यह है कि विदेशी मशीनों की तर्ज पर तैयार इस स्वदेशी मॉडल को उन्होंने JCB पर फिट करने के लिए विकसित किया है। राजेश के मुताबिक, मशीन करीब 2 से 2.5 टन तक वजन वाले बड़े पेड़ों को शिफ्ट करने में सक्षम है


YouTube देखकर आया आइडिया, ग्राहक की मांग ने बनाया आविष्कार

राजेश विश्वकर्मा बताते हैं कि उन्होंने काफी पहले YouTube पर विदेशों में इस्तेमाल होने वाली Tree Shifting Machines के वीडियो देखे थे। इन मशीनों की मदद से बड़े-बड़े पेड़ों को जड़ और आसपास की मिट्टी समेत निकालकर दूसरी जगह लगाया जाता था।भारत में इस तरह की मशीनों की उपलब्धता सीमित होने के बीच दिल्ली से एक ग्राहक उनके पास ऐसी मशीन बनवाने की इच्छा लेकर पहुंचा। इसके बाद राजेश ने डिजाइन तैयार किया और पारंपरिक ट्रक आधारित मॉडल की जगह JCB पर फिट होने वाला अपना मॉडल विकसित किया।राजेश ने बताया कि उनका प्रयोग सफल रहा और इसके बाद अलग-अलग राज्यों से मशीन की मांग आने लगी। अब तक करीब 10 से 12 मशीनें दिल्ली, गुजरात, पंजाब और उत्तर प्रदेश समेत दूसरे राज्यों के ग्राहकों को दी जा चुकी हैं।

कैसे काम करती है Tree Shifting Machine?

Tree Shifting Machine को आम तौर पर Tree Spade या Tree Transplanter भी कहा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य पेड़ को काटने के बजाय उसकी जड़ों के आसपास की मिट्टी समेत एक बड़े हिस्से को सुरक्षित निकालना होता है।मशीन में लगे बड़े हाइड्रोलिक ब्लेड या स्पेड पेड़ के चारों तरफ जमीन में प्रवेश करते हैं। ये पेड़ की जड़ों और उनके आसपास की मिट्टी को एक साथ पकड़कर Root Ball तैयार करते हैं। इसके बाद हाइड्रोलिक सिस्टम की मदद से पेड़ को जमीन से उठाया जाता है और उसे दूसरी जगह ले जाकर दोबारा लगाया जाता है। इस प्रक्रिया में पेड़ की जड़ों को जितना ज्यादा सुरक्षित रखा जाता है, उसके नए स्थान पर जीवित रहने की संभावना उतनी ही बेहतर हो सकती है। 

15 से 50 साल पुराने पेड़ों को भी बचाने में उपयोगी

राजेश के मुताबिक इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल ऐसे बड़े और पुराने पेड़ों को बचाने के लिए किया जा सकता है, जिन्हें सड़क चौड़ीकरण, भवन निर्माण या अन्य विकास परियोजनाओं के कारण हटाना जरूरी हो जाता है।मशीन का आकार और क्षमता पेड़ के आकार के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है। छोटे मॉडल ट्रैक्टर से जोड़े जा सकते हैं, जबकि बड़े Tree Transplanter भारी वाहनों या विशेष मशीनरी पर लगाए जाते हैं।

7 से 7.50 लाख की लागत, 8.50 लाख में मशीन

राजेश विश्वकर्मा के अनुसार उनकी तैयार की गई मशीन की निर्माण लागत करीब 7 से 7.50 लाख रुपये आती है, जबकि इसे करीब 8.50 लाख रुपये में उपलब्ध कराया जाता है।एक मशीन तैयार करने में लगभग 10 कारीगरों को करीब 15 दिन का समय लगता है। यानी यह सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर तैयार हो रही इंजीनियरिंग और रोजगार की एक पूरी प्रक्रिया है।

नूरसराय में हंसुआ-कुदाल से लेकर हाईटेक मशीन तक

नालंदा का नूरसराय बाजार इस बदलाव की एक दिलचस्प कहानी बताता है। कभी यहां मुख्य रूप से हंसुआ, खुरपी, कुदाल और दूसरे पारंपरिक कृषि औजार तैयार होते थे। धीरे-धीरे स्थानीय कारीगरों ने अपनी तकनीकी समझ और जरूरत के मुताबिक मशीन निर्माण की ओर कदम बढ़ाया।आज यहां रोटावेटर, थ्रेशर, हाइड्रोलिक ट्रॉली, कल्टीवेटर और अन्य कृषि मशीनों के साथ Tree Shifting Machine जैसी तकनीक भी तैयार होने लगी है।इस बदलाव के पीछे दुर्गा इंजीनियरिंग के प्रोपराइटर राजेश विश्वकर्मा की भूमिका बताई जाती है। राजेश के अनुसार नूरसराय का यह कारोबार अब सालाना करीब 60 करोड़ रुपये के टर्नओवर वाले मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में विकसित हो चुका है।

सरकारी नौकरी का सपना छोड़ पुश्तैनी कारोबार को बनाया आधुनिक

राजेश विश्वकर्मा के मुताबिक उनके पिता स्वर्गीय रामखिलावन विश्वकर्मा और दादा भी इसी पेशे से जुड़े थे। 1988-90 के दौर में नूरसराय में ऐसी महज 4-5 दुकानें थीं, जहां छोटे कृषि औजार बनाए जाते थे।राजेश ने 1995 में नालंदा कॉलेज से सामाजिक विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने कई सरकारी नौकरियों की परीक्षाएं दीं, लेकिन नौकरी में मन नहीं लगा। आखिरकार उन्होंने अपने भाइयों के साथ पुश्तैनी कारोबार में लौटने का फैसला किया।इसके बाद पारंपरिक औजार बनाने वाले कारोबार में आधुनिक तकनीक और मशीनरी को शामिल किया गया। धीरे-धीरे यही काम कृषि यंत्र निर्माण और अब Tree Shifting जैसी विशेष मशीनों तक पहुंच गया


बिहार से नेपाल-भूटान तक पहुंच रहे कृषि यंत्र

नूरसराय में तैयार होने वाले कृषि उपकरणों की मांग सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। राजेश के अनुसार यहां बने उत्पाद नेपाल और भूटान तक भी पहुंचते हैं। इसके अलावा असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड के किसान व डीलर भी यहां से मशीनरी खरीदते हैं।Tree Shifting Machine की मांग भी अब दूसरे राज्यों से आने का दावा किया जा रहा है। राजेश का कहना है कि यदि सरकार की ओर से तकनीकी और औद्योगिक स्तर पर सहयोग मिले तो नूरसराय की ऐसी मशीनों को बड़े पैमाने पर देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जा सकता है।

पेड़ बचाने वाली तकनीक के लिए बढ़ सकती है मांग

शहरों में सड़क, फ्लाईओवर, मेट्रो, भवन और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के विस्तार के साथ पुराने पेड़ों को बचाने की चुनौती भी बढ़ रही है। ऐसे में जहां पेड़ को उसी स्थान पर बचाना संभव नहीं होता, वहां Tree Transplantation एक विकल्प हो सकता है।नालंदा के नूरसराय में विकसित यह देसी मॉडल यह दिखाता है कि स्थानीय कारीगर सिर्फ पारंपरिक औजार बनाने तक सीमित नहीं हैं—जरूरत और तकनीक को जोड़कर वे ऐसी मशीनें भी बना सकते हैं जिनकी मांग देश के दूसरे हिस्सों से आने लगे।एक तरफ विकास के लिए पेड़ों को हटाने की मजबूरी और दूसरी तरफ पेड़ों को बचाने की तकनीक—नूरसराय की यह मशीन इसी बदलते भारत की एक दिलचस्प तस्वीर पेश करती है।

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