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बड़ा खुलासा! चुपके से पाट व्यवसायी भवन को बेचने की थी तैयारी? ट्रस्ट के बायलॉज ने खोला बड़ा राज



पूर्णिया। गुलाबबाग की बेशकीमती जमीन और पाट व्यवसायी भवन से जुड़ा विवाद अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सवाल सिर्फ एक ट्रस्ट के गठन का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये मूल्य की संपत्ति के स्वामित्व, नियंत्रण और भविष्य में उसके हस्तांतरण को लेकर उठ रहे हैं। आरोप है कि पाट व्यवसायी संघ की संपत्ति से जुड़े भवन के नाम पर एक ट्रस्ट का निबंधन कराया गया और उसके बायलॉज में ऐसी शक्तियां शामिल कर दी गईं, जिनके आधार पर ट्रस्ट के पदाधिकारियों को चल-अचल संपत्ति बेचने के संबंध में बड़े फैसले लेने का अधिकार दिया गया है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर जमीन और भवन पाट व्यवसायी संघ की संपत्ति है, तो फिर किसी दूसरे ट्रस्ट के बायलॉज में उस संपत्ति को बेचने, हस्तांतरित करने या अन्य तरीके से निपटाने जैसी शक्तियां क्यों रखी गईं?
यही सवाल अब पाट व्यवसायी संघ के पुराने सदस्यों, जमीनदाता परिवार और गुलाबबाग के व्यापारिक समुदाय के बीच चर्चा का केंद्र बन गया है।

बायलॉज की एक धारा ने बढ़ाई हलचल

विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ट्रस्ट के बायलॉज में शामिल वह प्रावधान है, जिसमें ट्रस्टियों को ट्रस्ट फंड में शामिल चल अथवा अचल संपत्ति के संबंध में व्यापक अधिकार दिए गए हैं। बायलॉज में ट्रस्टियों को संपत्ति को बेचने, हस्तांतरित करने, निपटाने, पुनर्निवेश करने अथवा अन्य तरीके से उससे संबंधित निर्णय लेने जैसी शक्तियां दिए जाने की बात सामने आई है। यही प्रावधान अब पूरे विवाद का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।

विरोध कर रहे लोगों का तर्क है कि यदि ट्रस्ट का उद्देश्य केवल पाट व्यवसायी भवन का संचालन और प्रबंधन करना था, तो उसके बायलॉज में संपत्ति के विक्रय और हस्तांतरण जैसी शक्तियों की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?


जमीनदाता परिवार ने उठाया सबसे बड़ा सवाल

पाट व्यवसायी संघ को जमीन उपलब्ध कराने वाले रामकुमार केडिया परिवार की ओर से आरोप लगाया गया है कि पाट व्यवसायी भवन की जमीन और भवन मूल रूप से (धर्मशाला) पाट व्यवसायी संघ की संपत्ति है।
परिवार की ओर से सवाल उठाया जा रहा है कि संघ की संपत्ति पर किसी अन्य संस्था या ट्रस्ट का नियंत्रण किस आधार पर बनाया गया? आरोप है कि ट्रस्ट के गठन और उसके बायलॉज की जानकारी संघ के सभी पुराने सदस्यों और संबंधित लोगों को पारदर्शी तरीके से नहीं दी गई।

अब मांग उठ रही है कि ट्रस्ट के निबंधन से लेकर उसके गठन में शामिल लोगों, बायलॉज, संपत्ति से संबंधित दस्तावेज और जमीन के मूल स्वामित्व से जुड़े सभी रिकॉर्ड सामने लाए जाएं। क्या भवन चलाने के नाम पर संपत्ति पर अधिकार की तैयारी थी? यही इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील सवाल है।

अगर ट्रस्ट केवल भवन के संचालन, रखरखाव और सामाजिक अथवा व्यापारिक गतिविधियों के लिए बनाया गया था, तो फिर उसे अचल संपत्ति के विक्रय और हस्तांतरण जैसी व्यापक शक्तियां देने का औचित्य क्या था? क्या यह महज एक सामान्य कानूनी प्रावधान था?
या फिर भविष्य में संपत्ति से जुड़े बड़े फैसलों के लिए पहले से कानूनी रास्ता तैयार किया जा रहा था? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आएगा।

वर्तमान ट्रस्टियों को लेकर भी उठ रहे सवाल

विवाद को और गंभीर बना रहा है वर्तमान ट्रस्टियों को लेकर उठाया जा रहा सवाल। आरोप लगाने वाले पक्ष का कहना है कि वर्तमान ट्रस्टी पाट व्यवसायी संघ के सदस्य नहीं हैं और उनके पास संघ की संपत्ति पर अधिकार का स्पष्ट आधार अथवा स्वामित्व संबंधी दस्तावेज नहीं है।

ऐसे में सवाल है कि जिस संस्था की संपत्ति बताई जा रही है, उसके प्रबंधन और संपत्ति से जुड़े अधिकार किसी अन्य संस्था को किस प्रक्रिया के तहत मिले?


#क्या पाट व्यवसायी संघ की बैठक में ऐसा कोई प्रस्ताव पारित हुआ था?

#क्या संघ के सदस्यों ने ट्रस्ट बनाने की अनुमति दी थी?

#क्या जमीनदाता परिवार की सहमति ली गई थी?

और सबसे महत्वपूर्ण—*क्या ट्रस्ट को संपत्ति पर मालिकाना अधिकार दिया गया था या सिर्फ भवन के संचालन की जिम्मेदारी?

इन सवालों का जवाब सामने आना बेहद जरूरी है।

1961 से जुड़ी संपत्ति, इसलिए मामला सामान्य विवाद से कहीं बड़ा

बताया जा रहा है कि पाट व्यवसायी संघ से जुड़ी यह संपत्ति वर्ष 1961 से चली आ रही है। ऐसे में विवाद केवल वर्तमान ट्रस्ट के गठन तक सीमित नहीं है। यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी संस्था ने ऐसी संपत्ति पर अधिकार जताने या उसके प्रबंधन का अधिकार हासिल करने का प्रयास किया, जिसका स्वामित्व किसी दूसरी संस्था के पास था, तो पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड, लेन-देन, आय-व्यय और संपत्ति से संबंधित दस्तावेजों की जांच भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसी वजह से पुराने सदस्य अब मांग कर रहे हैं कि 1961 से लेकर आज तक संपत्ति से जुड़े सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच हो।

“ट्रस्ट बनाकर संपत्ति पर कब्जे की तैयारी?”—सबसे बड़ा आरोप

विरोध कर रहे लोगों की आशंका है कि कहीं ट्रस्ट के गठन का उद्देश्य केवल भवन का संचालन करना नहीं, बल्कि धीरे-धीरे संपत्ति पर नियंत्रण स्थापित करना तो नहीं था। बायलॉज में संपत्ति को बेचने और हस्तांतरित करने जैसी शक्तियों का उल्लेख सामने आने के बाद मामला जरूर गंभीर हो गया है।

अब असली जांच इस बात की होगी कि ट्रस्ट के गठन के समय उसके पीछे क्या उद्देश्य था और ट्रस्ट फंड में दिखाई गई संपत्ति का वास्तविक स्वामी कौन है।

एक सप्ताह का अल्टीमेटम, फिर FIR की चेतावनी

वही गुलाबबाग निवासी इस मुद्दे पर वर्तमान ट्रस्टियों को कथित तौर पर एक सप्ताह का समय देने की बात कही है। उनका कहना है कि यदि ट्रस्ट का गठन गलत तरीके से हुआ है तो संबंधित लोग स्वयं ट्रस्ट को समाप्त करने की पहल करें और संपत्ति के संबंध में स्थिति स्पष्ट करें। ऐसा नहीं होने की स्थिति में थाने में प्राथमिकी दर्ज कराने की चेतावनी दी गई है।


जेल और करोड़ों की रिकवरी होगी

मामले से जुड़े कुछ लोगों का दावा है कि जांच में धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात या संपत्ति से संबंधित अन्य अनियमितताएं प्रमाणित हो चुकी है। कई दस्तावेज उनके हाथ लगे है। अब इस पूरे मामले में दस्तावेज सबसे बड़ा हथियार बन गए हैं। अब घपला करने वालो को जेल जाने से कोई रोक नहीं सकता और आर्थिक नुकसान की स्थिति में राशि की वसूली का दावा भी किया जा सकता है।


अब सामने आने चाहिए ये दस्तावेज

पाट व्यवसायी संघ के पुराने सदस्यों और जमीनदाता परिवार की मांग है कि मामले में पारदर्शिता के लिए—

* ट्रस्ट का पूरा निबंधन दस्तावेज सार्वजनिक किया जाए।
* ट्रस्ट का मूल बायलॉज सामने लाया जाए।
* संपत्ति से संबंधित मूल दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएं।
* पाट व्यवसायी संघ की बैठकों के प्रस्ताव और कार्यवाही सार्वजनिक की जाए।
* यह स्पष्ट किया जाए कि ट्रस्ट बनाने का प्रस्ताव किसने रखा था।
* ट्रस्टियों की नियुक्ति किस प्रक्रिया से हुई, इसकी जानकारी दी जाए।
* ट्रस्ट को संपत्ति के संबंध में अधिकार किस दस्तावेज के आधार पर मिला, यह बताया जाए।
* 1961 से अब तक संपत्ति से जुड़े आय-व्यय और अन्य वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कराई जाए।

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