मुस्लिम समुदाय के लोग पैगंबर मोहम्मद साहब के जन्मदिन को ईद-ए-मिलाद-उन-नबी के रूप में मनाते हैं। ईद ए मिलाद-उन-नबी इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक तीसरे महीने रबी-उल-अव्वल के 12 वें दिन मनाया जाता है। इस मौके पर मुस्लिम समुदाय के लोग पैगंबर मोहम्मद की याद में जगह-जगह जुलूस निकालते हैं और आयोजन भी करते हैं। इस साल ईद-ए-मिलाद-उन-नबी आज 26अगस्त को मनाई जाएगी। ईद-ए-मिलाद-उन-नबी का मुबारक मौका किसी एक समुदाय विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी इंसानियत को अमन, मोहब्बत, और आपसी भाईचारे की राह पर चलने का पैगाम देता है। पैगंबर मोहम्मद साहब का जीवन और उनकी दी गई शिक्षाएं आज के इस आधुनिक युग में भी समाज को सही दिशा दिखाने का काम करती हैं।" उक्त बातें हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेकुलर) अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के पुर्व प्रदेश महासचिव आरफीन बहार ने कही।
आरफीन बहार ने पैगंबर साहब के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि उनका जन्म 571 ईसवी में मक्का के प्रतिष्ठित कुरैशी खानदान में हुआ था। जन्म से पहले ही उनके पिता अब्दुल्लाह का साया सिर से उठ गया था और मात्र 6 वर्ष की अल्पआयु में माता आमिना का भी निधन हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण पहले उनके दादा अब्दुल मुत्तलिब और बाद में उनके चाचा अबू तालिब ने पूरी मोहब्बत के साथ किया।आरफीन बहार ने बताया कि जिस दौर में पैगंबर साहब का जन्म हुआ, उस समय अरब समाज अंधविश्वास, फरेब, हिंसा और नारी उत्पीड़न जैसी भयानक बुराइयों में जकड़ा हुआ था। ऐसे माहौल में भी उन्होंने अपनी सादगी, मीठी जुबान और अचूक ईमानदारी से सबका दिल जीता। उनकी इसी निष्पक्षता और सच बोलने की आदत के कारण मक्का के लोग उन्हें 'अल-अमीन' (सच्चा और ईमानदार) कहकर पुकारने लगे।बहार ने आगे जानकारी दी कि मक्का के पास स्थित 'गार-ए-हीरा' (हीरा गुफा) में ध्यान लगाने के दौरान पैगंबर साहब को फरिश्ते जिब्राइल के माध्यम से खुदा का पहला संदेश मिला। इसके बाद उन्होंने समाज से नफरत खत्म कर इंसानियत और एक अल्लाह की इबादत का प्रचार शुरू किया। जब उन्होंने जुल्म और बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई, तो मक्का के शक्तिशाली लोगों ने उनका कड़ा विरोध किया। अत्याचार इतने बढ़ गए कि उन्हें अपने समर्थकों के साथ मक्का छोड़कर मदीना की ओर रुख (हिजरत) करना पड़ा। लेकिन तमाम संघर्षों के बावजूद उन्होंने कभी दया और न्याय का रास्ता नहीं छोड़ा।
आरफीन बहार ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि ईद-ए-मिलाद-उन-नबी के इस पाक मौके पर हमें केवल खुशियां ही नहीं मनानी चाहिए, बल्कि पैगंबर साहब के बताए सादगी, साफ-सफाई, और अनाथों व जरूरतमंदों की मदद करने के उसूलों को अपने व्यावहारिक जीवन में उतारना चाहिए। यही उनके प्रति सच्ची अकीदत (श्रद्धा) होगी।
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