21 साल जेल में रहने के बाद हत्या के दोषी को हाईकोर्ट ने किया बरी, पुलिस जांच पर उठे गंभीर सवाल; DGP को कार्रवाई का आदेश
पटना/सिटी हलचल न्यूज़
बिहार में कानून-व्यवस्था और पुलिस की अनुसंधान प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला एक बड़ा मामला सामने आया है। हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे रंजीत झा को पटना हाईकोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया है। रंजीत झा करीब 21 वर्षों तक जेल में बंद रहा। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस की अनुसंधान प्रक्रिया और जेल प्रशासन की कार्यशैली पर भी नाराजगी जताई।न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति कुमार मनीष की खंडपीठ ने रंजीत झा की आपराधिक अपील मंजूर करते हुए वर्ष 2009 में समस्तीपुर फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को निरस्त कर दिया। कोर्ट के फैसले के बाद रंजीत झा को हत्या के मामले में बरी कर दिया गया।
2000 में हुई थी पवन कुमार झा की हत्या
मामला समस्तीपुर जिले के मुसरीघरारी थाना क्षेत्र का है। वर्ष 2000 में पवन कुमार झा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में रंजीत झा को आरोपी बनाया गया था। आरोप था कि 3,300 रुपये के विवाद को लेकर हत्या की गई।मामले की सुनवाई के बाद वर्ष 2009 में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने रंजीत झा को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद वह जेल में अपनी सजा काटता रहा
गरीबी बनी न्याय की राह में बड़ी बाधा
मामले में सबसे गंभीर पहलू यह सामने आया कि आर्थिक तंगी के कारण रंजीत झा लंबे समय तक हाईकोर्ट में अपनी सजा के खिलाफ अपील तक दाखिल नहीं कर सका। जानकारी के अनुसार करीब 16.5 साल तक हाईकोर्ट में अपील दाखिल नहीं हो सकी।इसका नतीजा यह हुआ कि जिस व्यक्ति को अंततः हाईकोर्ट ने बरी कर दिया, उसे वर्षों तक जेल में रहना पड़ा। यानी न्याय पाने की कानूनी लड़ाई में आर्थिक कमजोरी भी उसके लिए बड़ी बाधा बन गई।
20 साल की अवधि पूरी होने के बाद भी रिहाई का प्रस्ताव 11 महीने अटका रहा
मामले में जेल प्रशासन और रिमिशन बोर्ड की कार्यशैली को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए। बताया गया कि रंजीत झा 14 साल की वास्तविक सजा और छूट को मिलाकर करीब 20 साल की अवधि पूरी कर चुका था। इसके बावजूद उसकी समय-पूर्व रिहाई के प्रस्ताव को रिमिशन बोर्ड ने करीब 11 महीने तक बिना उचित कारण लंबित रखा।हाईकोर्ट ने इस स्थिति को गंभीरता से लिया और संबंधित अधिकारियों की कार्यशैली पर नाराजगी जाहिर की।
पुलिस की जांच पर हाईकोर्ट सख्त
इस मामले का सबसे अहम पहलू पुलिस अनुसंधान को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी रही। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि हत्याकांड की जांच में गंभीर खामियां थीं और गलत जांच के कारण रंजीत झा को मामले में फंसाए जाने की भूमिका की जांच जरूरी है।हाईकोर्ट ने बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि मामले की गलत जांच के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच कराई जाए। दोषी पाए जाने वाले संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करने का भी निर्देश दिया गया है।
जेल में लंबे समय रहने से मानसिक रूप से बीमार हुआ रंजीत
करीब दो दशक से अधिक समय जेल में बिताने का असर रंजीत झा की मानसिक स्थिति पर भी पड़ा। हाईकोर्ट ने उसे लंबे समय तक जेल में रहने के कारण मानसिक रूप से बीमार बताया और उसके भविष्य को लेकर सरकार को महत्वपूर्ण निर्देश दिए।कोर्ट ने बिहार सरकार को रंजीत झा के इलाज और पुनर्वास का पूरा खर्च उठाने का निर्देश दिया है। यानी जेल से बाहर आने के बाद उसके उपचार और सामान्य जीवन में पुनर्वास की जिम्मेदारी सरकार की होगी
फैसले ने कानून व्यवस्था और न्याय व्यवस्था पर भी खड़े किए सवाल
पटना हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक कैदी की रिहाई तक सीमित नहीं है। यह मामला पुलिस जांच, न्याय तक गरीबों की पहुंच, जेल प्रशासन और समय-पूर्व रिहाई की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।एक व्यक्ति को हत्या के मामले में दोषी ठहराकर उम्रकैद की सजा दी गई, वह करीब 21 साल तक जेल में रहा और बाद में हाईकोर्ट ने उसकी सजा को निरस्त करते हुए उसे बरी कर दिया। ऐसे में पुलिस अनुसंधान की गुणवत्ता और शुरुआती जांच में बरती गई सावधानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।हाईकोर्ट द्वारा खुद पुलिसकर्मियों की भूमिका की जांच और कार्रवाई का निर्देश दिए जाने से मामला और गंभीर हो गया है। अब DGP स्तर पर होने वाली जांच से यह स्पष्ट होगा कि हत्याकांड की जांच में आखिर किन स्तरों पर चूक हुई और रंजीत झा को आरोपी बनाने के पीछे जिम्मेदार अधिकारियों की क्या भूमिका थी।यह फैसला उन मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां आर्थिक रूप से कमजोर आरोपी लंबे समय तक कानूनी सहायता के अभाव में जेल में बंद रहते हैं। रंजीत झा के मामले में हाईकोर्ट के निर्देश ने यह भी रेखांकित किया है कि न्याय मिलने के साथ-साथ गलत तरीके से लंबे समय तक जेल में रहने वाले व्यक्ति के इलाज और पुनर्वास की जिम्मेदारी भी राज्य की है।



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