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कबीर मठ,रायपुर रानीपतरा में साधु-सतों एवं भक्तों की बैठक आयोजित

पूर्णियां पूर्व/राजेश यादव 

पूर्णिया। सद्गुरु कबीर मठ रायपुर रानीपतरा, मटिया के सत्संग हॉल में आज समस्त कबीरपंथी साधु-संतों, साधकों एवं भक्तों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता सद्गुरु कबीर मठ,रायपुर,रानीपतरा के न्यासी महंत जयस्वरूप साहब ने की।बैठक में उपस्थित साधु-संतों एवं भक्तों ने बीते दिनों कुछ लोगों द्वारा मठ के विरुद्ध की गई कथित साजिशों पर चिंता व्यक्त की। उपस्थित लोगों ने ऐसी गतिविधियों को कबीरपंथ एवं मठ की परंपरा के हितों के विरुद्ध बताते हुए मठ की गरिमा, परंपरा एवं संपत्ति की रक्षा के लिए सभी आवश्यक वैधानिक पहल किए जाने का संकल्प लिया। इस दिशा में नेतृत्व करने के लिए साधु-संतों एवं भक्तों ने महंत जयस्वरूप साहब से आग्रह किया।

अपने संबोधन में महंत जयस्वरूप साहब ने संत सम्राट सद्गुरु कबीर साहब के शब्दों—

“जेते औरत मर्द उपाने, सो सब रूप तुम्हारा।

कबीर पोंगरा अल्लह राम का,सो गुरु पीर हमारा॥”

का स्मरण करते हुए सभी जीवों की तात्विक एकता और सद्भाव का संदेश दिया।उन्होंने कहा कि “आप सभी जो यहां बैठे हैं, हमारे लिए गुरु के समान हैं। आप सभी के दिशा-निर्देश और सहयोग से सद्गुरु कबीर मठ रायपुर रानीपतरा अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार समाज एवं कबीरपंथ की सेवा कर रहा है और आगे भी करता रहेगा।”

स्वामी वीरेंद्र दास ने बताया कि सद्गुरु कबीर मठ रायपुर मटिया अत्यंत प्राचीन मठ है। पूज्य गुरुदेव जयस्वरूप साहेब लंबे समय से इसके न्यासी महंत के रूप में व्यवस्था संभाल रहे हैं। उनके अनुसार, बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा उन्हें न्यासी महंत घोषित किया गया है। मठ में प्रतिदिन संत सम्राट कबीर साहेब की उपासना-विधि के अनुसार सत्संग, भजन एवं ध्यान-उपासना भक्तिमय वातावरण में होती है।

स्वामी वीरेंद्र दास ने कहा कि सद्गुरुदेव आचार्य धर्मस्वरूप साहेब की प्रेरणा और भक्त समाज के सहयोग से यह मठ निरंतर विकास की ओर अग्रसर हुआ है। कभी घास-फूस की छोटी-सी झोपड़ी के रूप में रहा यह स्थान आज धीरे-धीरे एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र के रूप में भी विकसित हो रहा है। यहां आने वाले राहगीरों तथा कबीरपंथी साधु-संतों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था भी की जाती है।

मठ की भूमि के संबंध में उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोगों की लंबे समय से इस जमीन पर नजर रही है तथा भूमि को निजी हित में उपयोग करने के प्रयास किए जाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि मठ की भूमि से संबंधित विभिन्न प्रकार के दस्तावेज, रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज एवं एग्रीमेंट के प्रयासों की जानकारी सामने आती रही है।

उन्होंने पूर्व के एक मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि फकीर दास और कीर्तन दास द्वारा बासगीत पर्चा बनाकर परिवार के साथ मठ परिसर में रहने का प्रयास किया गया था। उनके अनुसार, अनुमंडल पदाधिकारी के आदेश पर सरकारी मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में उन्हें वहां से हटाया गया।

स्वामी वीरेंद्र दास ने कहा कि पूज्य जयस्वरूप साहेब की दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण मठ की भूमि को सुरक्षित रखने में सफलता मिली है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ तत्वों द्वारा मठ एवं विद्यालय को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न करने और साधु-संतों तथा आम जनता को प्रभावित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मठ एवं विद्यालय के हितैषी होने का दावा करने वाले लोगों को भी अपने पूर्व के कार्यों और भूमिका के संबंध में समाज के सामने स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पूर्व में दूषित वातावरण बनाने के प्रयासों में बाहरी तत्वों के आर्थिक सहयोग की जानकारी उन्हें मिली है।

स्वामी वीरेंद्र के अनुसार मठ किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि समाज की सार्वजनिक आध्यात्मिक धरोहर है।

उन्होंने कहा कि पूज्य जयस्वरूप साहेब आजीवन ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हुए मठ की सेवा कर रहे हैं और उनका अपना कोई पारिवारिक उत्तराधिकारी नहीं है। उनके शरीरांत के बाद किसी योग्य कबीरपंथी साधु द्वारा मठ की व्यवस्था संभाली जा सकती है।

उन्होंने अंत में कहा कि “यह मठ आप सभी की धरोहर है। इसकी भूमि, परंपरा और आध्यात्मिक स्वरूप को सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।”

बैठक में उपस्थित साधु-संतों एवं भक्तों मैं मुख्य रूप से संत श्री गौरव साहब, संत जयदेव स्वरूप साहेब, संत प्रकाश स्वरूप साहेब, ब्रह्मचारी दिलीप साहब, रवि साहब, अरुण साहब, प्रदीप साहब, शुभलाल साहब, दिगंबर गोस्वामी, चंदन ऋषि देव जी,प्रोफेसर तीर्थानंद मेहता जी, राजेश जी,सुरेश यादव,मंटू यादव,अरुण जी संतोष कुमार साह, लीलानंद यादव ने मठ की आध्यात्मिक परंपरा को अक्षुण्ण रखने तथा उसके विकास एवं संवर्धन के लिए एकजुट होकर कार्य करने का संकल्प व्यक्त किया।

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