25 जून 1975 को देश में लगाए गए आपातकाल की 51वीं वर्षगांठ पर भारतीय जनता पार्टी, पूर्णिया द्वारा टाउन हॉल, गिरिजा चौक में "संविधान हत्या दिवस" कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारत सरकार के केंद्रीय राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस दौरान भाजपा नेताओं और आपातकाल के प्रत्यक्षदर्शियों ने उस दौर को याद करते हुए कांग्रेस और तत्कालीन सरकार पर लोकतंत्र को कुचलने का आरोप लगाया।
वक्ताओं ने कहा कि 25 जून 1975 की रात देश के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे काला अध्याय थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया। इसके बाद नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगा दिए गए, विपक्षी नेताओं को जेलों में बंद किया गया और प्रेस पर सेंसरशिप थोप दी गई। उन्होंने कहा कि आपातकाल केवल एक राजनीतिक फैसला नहीं था, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों की हत्या थी।
कार्यक्रम में मौजूद आपातकाल के प्रत्यक्षदर्शियों ने दावा किया कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सबसे मजबूत संघर्ष बिहार की धरती पर लड़ा गया था। उन्होंने कहा कि आज भी बिहार के गांवों, कस्बों और परिवारों में उस आंदोलन की यादें जीवित हैं, जिसने तानाशाही के खिलाफ जनआंदोलन का रूप लिया था।
वक्ताओं ने कहा कि आपातकाल लागू होने के बाद बिहार में भी व्यापक असर देखने को मिला। अनेक राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारियों को हिरासत में लिया गया, विरोध-प्रदर्शनों पर रोक लगाई गई और सरकारी दमन का दौर शुरू हो गया। इसके बावजूद लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष जारी रहा।
इस अवसर पर भाजपा नेताओं ने कहा कि बिहार में शुरू हुआ छात्र आंदोलन आगे चलकर पूरे देश में लोकतंत्र बचाने के अभियान में बदल गया। इस आंदोलन का नेतृत्व लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने किया था। उनके आह्वान पर हजारों छात्र और युवा सड़कों पर उतरे और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के लिए संघर्ष किया।
कार्यक्रम में यह भी दावा किया गया कि आपातकाल के दौरान कई विपक्षी नेता और कार्यकर्ता भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाते रहे। सरकारी कार्रवाई और गिरफ्तारियों के बावजूद लोकतंत्र की आवाज को दबाया नहीं जा सका।
भाजपा नेताओं ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनसंघ की भूमिका को भी रेखांकित करते हुए कहा कि आपातकाल के दौरान इन संगठनों के कार्यकर्ताओं ने आंदोलन को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रतिबंधों और गिरफ्तारियों के बावजूद कार्यकर्ता भूमिगत रहकर संदेशों और संगठनात्मक गतिविधियों को आगे बढ़ाते रहे।
केंद्रीय राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे ने कहा कि आपातकाल की घटनाएं नई पीढ़ी को लोकतंत्र की रक्षा के प्रति सजग रहने का संदेश देती हैं। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए समाज को हमेशा सतर्क रहना होगा।
कार्यक्रम के अंत में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले आंदोलनकारियों और आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले लोगों को याद किया गया तथा संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प लिया गया।
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