बिहार के रक्सौल की रेलवे गुमटी नंबर 33 अब सिर्फ एक रेलवे क्रॉसिंग नहीं रही। आने वाले वर्षों में जब-जब इस गुमटी का जिक्र होगा, तब-तब एक ऐसे युवक की कहानी भी सुनाई जाएगी जिसने विपरीत परिस्थितियों को अपनी ताकत बनाया और संघर्ष की पटरियों पर चलते हुए डीएसपी की मंजिल हासिल कर ली। यह कहानी है रेलवे कर्मचारी राजू कुमार की, जिनका चयन 70वीं बीपीएससी परीक्षा में डीएसपी (उप पुलिस अधीक्षक) पद के लिए हुआ है।
यह सफलता केवल एक नौकरी पाने की कहानी नहीं है, बल्कि उस बेटे की जीत है जिसने बचपन में पिता को खो दिया, आर्थिक तंगी से जूझा, रेलवे की नौकरी करते हुए सपनों को जिंदा रखा और आखिरकार अपनी मेहनत से इतिहास रच दिया।
12 साल की उम्र में सिर से उठ गया पिता का साया
राजू कुमार मूल रूप से समस्तीपुर जिले के रहने वाले हैं। उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा झटका तब लगा जब वह महज 12 वर्ष के थे। पिता का निधन हो गया और परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि बड़े शहरों में जाकर महंगी कोचिंग या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकें।
लेकिन मां ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाने और आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। राजू बताते हैं कि कठिन से कठिन समय में भी उनकी मां ने उनका हौसला टूटने नहीं दिया। दो भाइयों और एक बहन में सबसे छोटे राजू के लिए मां ही सबसे बड़ी प्रेरणा बनीं।
पहली नौकरी मिली रेलवे में, लेकिन सपना उससे बड़ा था
पढ़ाई पूरी करने के बाद राजू ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू की और पहली ही कोशिश में रेलवे के ग्रुप-डी पद पर चयनित हो गए। करीब पांच वर्षों से वे रेलवे में कार्यरत हैं और रक्सौल की गुमटी नंबर 33 पर गेटमैन के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
गर्मी की तपिश, मूसलाधार बारिश और कड़ाके की ठंड के बीच रेलवे ट्रैक पर ड्यूटी देना आसान नहीं होता। लेकिन राजू ने कभी इसे अपनी मंजिल के रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया। ड्यूटी के बीच मिलने वाला हर खाली पल उनके लिए किताबों और नोट्स का समय होता था।
दोस्तों ने कहा- बीपीएससी की तैयारी करो, और बदल गई जिंदगी
राजू बताते हैं कि रेलवे में नौकरी के दौरान दोस्तों ने उन्हें बीपीएससी की तैयारी करने की सलाह दी। शुरुआत में उन्हें यह रास्ता कठिन लगा, लेकिन उन्होंने चुनौती स्वीकार कर ली।
बड़े शहरों की कोचिंग उनके लिए संभव नहीं थी। इसलिए उन्होंने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से तैयारी शुरू की। किताबें पढ़ीं, मोबाइल पर शिक्षकों के लेक्चर देखे, नोट्स बनाए और लगातार अभ्यास करते रहे।
रेलवे की नौकरी और पढ़ाई के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। दिन में ड्यूटी और रात में पढ़ाई उनकी दिनचर्या बन गई।
रिजल्ट आया, डीएसपी बने... फिर भी अगले दिन ड्यूटी पर पहुंचे
70वीं बीपीएससी का परिणाम घोषित हुआ तो राजू कुमार का चयन डीएसपी पद के लिए हो गया। परिवार, रिश्तेदार और पूरे इलाके में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन सफलता मिलने के बाद भी उनके कदम जमीन पर ही रहे।
सबसे भावुक करने वाली बात यह रही कि डीएसपी बनने की खबर मिलने के अगले दिन भी राजू अपनी रेलवे ड्यूटी पर समय से पहुंचे। पूरे दिन गुमटी नंबर 33 पर अपनी जिम्मेदारी निभाते रहे। लोग उन्हें बधाई देने आते रहे, लेकिन उन्होंने पहले अपना कर्तव्य निभाया।
उनकी यह सादगी और कर्तव्यनिष्ठा आज हर किसी के लिए मिसाल बन गई है।
मां को दिया सफलता का श्रेय
राजू कुमार अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपनी मां को देते हैं। उनका कहना है कि अगर मां ने कठिन परिस्थितियों में उनका मनोबल नहीं बढ़ाया होता तो शायद वे यहां तक नहीं पहुंच पाते।
वह अपने परिवार के बड़े सदस्यों, शिक्षकों और शुभचिंतकों को भी इस उपलब्धि का भागीदार मानते हैं। उनके अनुसार संघर्ष के दिनों में मिले हर सहयोग ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी।
गुमटी का छोटा सा केबिन बना सफलता का केंद्र
रक्सौल की गुमटी नंबर 33 पर बैठकर शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यही छोटा सा केबिन एक दिन बिहार पुलिस के भावी डीएसपी को जन्म देगा। रेलवे गेट खोलने और बंद करने के बीच का समय राजू के लिए पढ़ाई का समय था। यही जगह उनके सपनों की प्रयोगशाला बनी।
आज उनकी सफलता यह साबित करती है कि मंजिल तक पहुंचने के लिए बड़े संसाधनों से ज्यादा जरूरी बड़ा हौसला होता है।
युवाओं के लिए संदेश
राजू कुमार की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो आर्थिक अभाव, पारिवारिक परेशानियों या संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को छोड़ने का सोचते हैं। उन्होंने साबित कर दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदार हो तो सफलता एक दिन जरूर कदम चूमती है।
रक्सौल की गुमटी नंबर 33 आज सिर्फ रेलवे क्रॉसिंग नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और सफलता का प्रतीक बन चुकी है। यहां से निकली राजू कुमार की कहानी आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाती रहेगी कि सपनों की कोई सीमा नहीं होती, बस उन्हें पूरा करने का जज्बा होना चाहिए।
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