पूर्णिया के सहायक खजांची थाना क्षेत्र के बाड़ीहाट से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है। आँखों से लाचार रितनेश राज आज अपने ही हक के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। जिस दुकान के सहारे वह अपना जीवन चला रहा था, अब उसी पर अपनों और सिस्टम की मिलीभगत से कब्जा करने का आरोप लगा है।
रितनेश राज ने बताया कि उसके पिता नगर निगम द्वारा मिले खुसकीबाग आढ़त में सब्जी बेचकर परिवार का भरण-पोषण करते थे। पिता की मौत के बाद परिवार का इकलौता बेटा होने के नाते रितनेश ने उसी आढ़त को किराये पर देकर अपना गुजारा शुरू किया। रितनेश की छह बहनें हैं, जिनकी शादी हो चुकी है और वे अपने-अपने घरों में रहती हैं। लेकिन पिता की मौत के बाद रितनेश की जिंदगी में संघर्ष और बढ़ गया। पीड़ित का आरोप है कि नगर निगम का कर्मचारी दीपक मंडल और उसके एक बहनोई ने फर्जी कागजात तैयार कर आढ़त को हड़प लिया। अब उस दुकान को बेचने की तैयारी भी चल रही है।
रितनेश ने बताया कि उसकी छहों बहनों ने स्टाम्प पेपर पर लिखकर दिया था कि जीविकोपार्जन के लिए भाई की दुकान में वे किसी तरह की हिस्सेदारी नहीं लेंगी। इस बात की पुष्टि उसकी अन्य बहनों ने भी की। बावजूद इसके, सबसे छोटे बहनोई ने निगमकर्मी के साथ मिलकर उसे दुकान से बेदखल करा दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस दस्तावेज के आधार पर रितनेश को हटाया गया, उसमें उसके पिता का अंगूठे का निशान लगाया गया है, जबकि उसके पिता पढ़े-लिखे थे और बैंक समेत कई सरकारी दस्तावेजों में उनके हस्ताक्षर मौजूद हैं। ऐसे में पूरे मामले में फर्जीवाड़े की आशंका गहरा गई है।
पीड़ित का आरोप है कि जब वह न्याय की उम्मीद लेकर नगर निगम पहुंचा तो आरोपी निगमकर्मी दीपक मंडल ने आँखों से दिव्यांग रितनेश और पैरों से दिव्यांग उसकी बहन को दुत्कार कर भगा दिया। आखिरकार रितनेश ने नगर आयुक्त को आवेदन देकर इंसाफ की गुहार लगाई है।
अब सवाल यह है कि जब अपनों का ही सहारा छिन जाए तो एक दिव्यांग व्यक्ति आखिर कहाँ जाए? रितनेश के पास न कमाने वाला कोई है और न ही कोई दूसरा सहारा। उसका एकमात्र सहारा वही दुकान है, जिस पर कब्जे का आरोप लग रहा है। ऐसे में जरूरत है कि प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करे और रितनेश को न्याय दिलाए।
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