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रुक्मिणी–कृष्ण विवाह में बेटी की विदाई के मार्मिक दृश्य ने श्रद्धालुओं को रुला दिय

रुक्मिणी–कृष्ण विवाह में बेटी की विदाई के मार्मिक दृश्य ने श्रद्धालुओं को रुला दिया

बिहार,पूर्णियां, राजनीति

बैसा प्रखंड के अनगढ़ हाट में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का अंतिम दिवस अत्यंत भावनात्मक वातावरण में संपन्न हुआ, ऐतिहासिक अनगढ़ हाट की पावन धरती पर गुरुदेव सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या कथा व्यास साध्वी सुश्री मेरुदेवा भारती ने रुक्मिणी–कृष्ण विवाह प्रसंग का ऐसा करुण और संवेदनशील वर्णन प्रस्तुत किया कि कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और अनेक श्रोताओं की आँखें अश्रुपूरित हो गईं, बेटी की विदाई के दृश्य का वर्णन करते समय कथा व्यास का स्वर स्वयं भर्रा गया और वातावरण पूरी तरह भावुकता से भर गया, उन्होंने कहा कि बेटी पराया धन नहीं बल्कि माता–पिता की आँखों का नूर होती है और जब वह विदा होती है तो केवल घर नहीं छोड़ती बल्कि माता–पिता का हृदय भी अपने साथ ले जाती है, भारतीय संस्कृति में बेटी की विदाई मात्र एक सामाजिक परंपरा नहीं बल्कि संस्कारों से जुड़ा हुआ गहन भावनात्मक अनुष्ठान है जो परिवार, समाज और संस्कृति के भीतर करुणा, त्याग, प्रेम और उत्तरदायित्व की भावना को जीवित रखता है, कथा व्यास ने भावार्थ समझाते हुए कहा कि रुक्मिणी केवल विदर्भ की राजकुमारी नहीं बल्कि जीवात्मा का प्रतीक हैं जो संसार रूपी बंधनों से मुक्त होकर भगवान रूपी परमात्मा से मिलन के लिए व्याकुल रहती है, रुक्मिणी द्वारा श्रीकृष्ण को लिखा गया पत्र शरणागति, अटूट प्रेम और पूर्ण विश्वास का अनुपम उदाहरण है जो भक्त और भगवान के संबंध को दर्शाता है, साध्वी मेरुदेवा भारती ने कहा कि जब जीव अपने अहंकार, भय और संदेह को त्यागकर पूर्ण विश्वास के साथ ईश्वर की शरण में जाता है तभी उसका वास्तविक कल्याण होता है, कथा के समापन अवसर पर अनगढ़ हाट सहित आसपास के क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं ने कथा व्यास एवं उनकी पूरी टीम को मंच पर भावपूर्ण और अनौपचारिक विदाई दी, इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि संतों की विदाई वास्तव में संभव नहीं होती क्योंकि संत किसी एक स्थान, मंच या समय से बंधे नहीं होते बल्कि वे समाज, जनकल्याण और चेतना के जागरण के लिए निरंतर गतिमान रहते हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर उनका आगे बढ़ना ही विदाई कहलाता है, वक्ताओं ने भावुक शब्दों में कहा कि भौतिकता के इस युग में जहाँ अधिकांश लोग सुख–सुविधा और स्वार्थ की दौड़ में लगे हुए हैं वहीं कुछ विरले लोग ही ऐसे होते हैं जो अपने जीवन को संन्यास, सेवा और साधना के मार्ग पर समर्पित कर समाज के लिए जीते हैं, ऐसे संतों का प्रत्येक श्वास लोककल्याण के लिए और प्रत्येक कदम समाज को सही दिशा देने के लिए होता है, श्रद्धालुओं ने नम आँखों और कृतज्ञ हृदय से कहा कि सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा भले ही संपन्न हो गई हो लेकिन कथा व्यास साध्वी मेरुदेवा भारती के वचन, संदेश और संस्कार लंबे समय तक बैसा प्रखंड के अनगढ़ हाट की धरती और श्रद्धालुओं के जीवन को आध्यात्मिक दिशा और प्रेरणा देते रहेंगे।

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