पूर्णियाँ/सिटी हलचल न्यूज़
मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी पूर्णिया द्वारा प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश देने के दस वर्ष बीत जाने के बावजूद सदर थाना के पूर्व और वर्तमान थानाध्यक्ष के द्वारा अबतक प्राथमिकी दर्ज नहीं किए जाने का मामला प्रकाश में आया है। जिसको लेकर पीड़ित ने एक बार फिर पुलिस अधीक्षक से लेकर डीजीपी बिहार तक को आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई है। मामले की जानकारी देते हुए कप्तानपाड़ा निवासी आवेदक विक्की भवाल ने बताया कि मेरे द्वारा मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी, पूर्णियों के समक्ष प्राथमिकी दर्ज कराने का आदेश देने हेतु अभियोग पत्र संख्या 1222/2013 दायर किया, जिसमें मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी पूर्णियाँ द्वारा पारित आदेश दिनांक 08.05.2013 ई० को संबंधित सदर थाना में प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया गया था । जिसका मेमो नं0 242 दिनांक 08.05.2013 ई0 को सदर थाना में प्राथमिकी दर्ज करने हेतु पुलिस अधिक्षक के माध्यम से भेजा गया
जो आवेदन अबतक थाना में प्राथमिकी दर्ज हेतु थाना के सिरिस्ता रूम में दस वर्षों से रखा हुआ है। इस संबंध में थाना के कई थाना अध्यक्ष व वर्तमान थानाध्यक्ष से मिला भी। लेकिन प्राथमिकी दर्ज करने के नाम पर न नुकुर किया जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी पूर्णियाँ द्वारा पारित आदेश को थानाध्यक्ष सदर द्वारा विपक्षी जयन्त भवाल एवं अन्य विपक्षीगण के मेल में आकर प्राथमिकी दर्ज नही कर रहे है। जबकि मैंने मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी पूर्णियाँ द्वारा पारित ओदश व अभियोग पत्र संख्या-1222/13 की प्रति एवं प्राथमिकी दर्ज होने की आदेश का नकल भी जिसका मेमो नं0-242, दिनांक 08.05.2013 है निकाल कर आवेदन के साथ संलग्न किया है। तथा मैने एसपी पूर्णिया, आईजी पूर्णिया, डीजीपी बिहार को आवेदन देकर अपने स्तर से जाँच कर उचित कानूनी कार्यवाही करते हुए संबंधित थाना को अविलम्ब प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश देने की गुहार लगाई है
बताते चलें कि माननीय उच्च न्यायालय पटना द्वारा क्रिमिनल रिट संख्या 153/2017 के आलोक में जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद द्वारा दिनांक 09. 09.2022 को दिशा निर्देश दिया गया था कि न्यायालय के द्वारा जो भी आवेदन 156(3) सीआरपीसी अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज हेतु थाना भेजा गया हो, उसे सभी थाना के थानाध्यक्ष को हर हाल में प्राथमिकी दर्ज करना सुनिश्चित करना होगा। चाहे मामला कितना भी पुराना क्यों ना हो। ऐसे में अगर वर्षों पूर्व न्यायालय द्वारा दिया गया आदेश का पालन नहीं किया गया है तो यह थानाध्यक्ष के द्वारा कानून का धज्जियां उड़ाया जा रहा है, और इसकी जांच कर कड़ी कार्रवाई करने की आवश्यकता है।



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