कहा जाता है कि बेजुबान जीवों की सेवा सबसे बड़ा पुण्य कार्य है। इस सेवा में न धर्म देखा जाता है और न ही जाति, बल्कि सेवा का भाव ही सबसे बड़ी पहचान होता है। भारत-नेपाल सीमावर्ती शहर जोगबनी में दो स्थानीय नागरिक इसी सोच को अपने कर्मों से साकार कर रहे हैं।
जोगबनी रेलवे प्रांगण में स्थानीय रेलवे कर्मचारी गोरेलाल तिवारी और स्थानीय दुकानदार जमशेद आलम प्रतिदिन आवारा बेजुबान पशुओं की निस्वार्थ सेवा में जुटे रहते हैं। दोनों नियमित रूप से कुत्तों और अन्य बेसहारा जानवरों को रोटी, बिस्कुट, चना एवं अन्य खाद्य सामग्री खिलाते हैं, ताकि कोई भी बेजुबान भूखा न रहे।
इनकी सेवा केवल भोजन तक ही सीमित नहीं है। ठंड के मौसम में दोनों पुराने कपड़ों और बोरों से विशेष वस्त्र तैयार कर बेजुबान पशुओं को पहनाते हैं, जिससे उन्हें कड़ाके की ठंड से राहत मिल सके। वर्षों से जारी उनकी यह मानवीय पहल लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
स्थानीय लोगों ने गोरेलाल तिवारी और जमशेद आलम के इस सराहनीय कार्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि आज के समय में, जब लोग अपने स्वार्थ में व्यस्त रहते हैं, ऐसे निस्वार्थ सेवा कार्य समाज में मानवता, करुणा और संवेदनशीलता का संदेश देते हैं। उनका मानना है कि दोनों की यह पहल अन्य लोगों को भी बेजुबान जीवों की सेवा और संरक्षण के लिए प्रेरित करती है।
यह सेवा इस बात का संदेश देती है कि इंसानियत की कोई जाति या धर्म नहीं होता, बल्कि जरूरतमंद की मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म है।
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