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पोठिया में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया हुल दिवस पोठिया में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया हुल दिवस



पोठिया प्रखंड के बुधरा पंचायत अंतर्गत दिशाम माझिथान में मंगलवार को आदिवासी समाज ने 1855 के ऐतिहासिक संथाल हूल (विद्रोह) के महानायक सिदो मुर्मू, कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू की स्मृति में हूल दिवस पूरे श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया। कार्यक्रम का आयोजन दिशाम माझिथान के अध्यक्ष तशु मरांडी, सचिव विप्लव मरांडी तथा उपाध्यक्ष सुपल मुर्मू के नेतृत्व में किया गया।
हूल दिवस के अवसर पर प्रखंड के विभिन्न गांवों से सैकड़ों की संख्या में आदिवासी समाज के महिला-पुरुष, युवा, बुजुर्ग और बच्चे पारंपरिक वेशभूषा, तीर-धनुष, मांदर, नगाड़े एवं अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ कार्यक्रम स्थल पहुंचे। सर्वप्रथम शहीदों के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। इसके बाद विधिवत धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-अर्चना संपन्न हुई।
इस अवसर पर भाजपा नेता सह बीस सूत्री जिला सदस्य संजय उपाध्याय मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि हूल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि अन्याय, शोषण और दमन के विरुद्ध संघर्ष, स्वाभिमान और सामाजिक न्याय का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि संथाल हूल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पहली बड़ी जनक्रांतियों में से एक था, जिसने देशभर में आजादी की चेतना को नई दिशा दी।
कार्यक्रम के दौरान दिशाम माझिथान से पोठिया बाजार तक एक विशाल शोभायात्रा निकाली गई। पारंपरिक वेशभूषा में सजे आदिवासी युवक-युवतियों ने तीर-धनुष और पारंपरिक हथियारों के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन किया। मांदर और नगाड़े की थाप पर पारंपरिक नृत्य करते हुए प्रतिभागियों ने वीर शहीदों के सम्मान में नारे लगाए और पुनः माझिथान पहुंचकर सभा में शामिल हुए।
सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य और लोकगीतों की मनमोहक प्रस्तुति देकर वीर शहीदों के संघर्ष, बलिदान और आदिवासी संस्कृति की गौरवशाली परंपरा को जीवंत किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों की भागीदारी रही।
सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि 30 जून 1855 को सिदो-कान्हू के नेतृत्व में संथाल समुदाय ने अंग्रेजी शासन और महाजनी शोषण के विरुद्ध ऐतिहासिक हूल का बिगुल फूंका था। इस आंदोलन में हजारों आदिवासियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वतंत्रता, सम्मान और अधिकारों की लड़ाई लड़ी। वक्ताओं ने कहा कि आज भी हूल दिवस समाज को अन्याय के खिलाफ संघर्ष, एकता और आत्मसम्मान का संदेश देता है।
वक्ताओं ने आदिवासी समाज की संस्कृति, भाषा, परंपरा और पहचान को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि जल, जंगल और जमीन आदिवासी जीवन का आधार हैं। इनके संरक्षण के साथ-साथ संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा के लिए समाज को संगठित होकर कार्य करना होगा। युवाओं से शिक्षा को प्राथमिकता देने, सामाजिक जागरूकता बढ़ाने तथा अपनी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान भी किया गया।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों ने वीर शहीदों के बताए मार्ग पर चलने, समाज में एकता बनाए रखने, शिक्षा को बढ़ावा देने तथा सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने का सामूहिक संकल्प लिया। सभी शहीदों के सम्मान में दो मिनट का मौन रखकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
इस अवसर पर स्थानीय जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, विभिन्न आदिवासी संगठनों के पदाधिकारी, बुद्धिजीवी, छात्र-छात्राएं तथा बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। पूरा कार्यक्रम शांतिपूर्ण, गरिमामय और पारंपरिक उत्साह के साथ संपन्न हुआ।

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