पंचायत से राष्ट्रपति भवन तक चुनावी सफर, 281 चुनाव लड़कर गिनीज रिकॉर्ड बनाने वाले ‘धरती पकड़’ नहीं रहे
पटना/सिटी हलचल न्यूज़
बिहार के चर्चित ‘धरती पकड़’ नागरमल बाजोरिया नहीं रहे। 97 वर्ष की उम्र में पटना में ली अंतिम सांस, चुनावी मैदान में उतरने का ऐसा जुनून कि पंचायत से लेकर राष्ट्रपति पद तक आजमाई किस्मत चुनाव में जीत हासिल करना हर उम्मीदवार का सपना होता है। कोई विधायक बनने के लिए मैदान में उतरता है तो कोई सांसद बनने के लिए। लेकिन एक शख्स ऐसा भी था, जिसके लिए चुनाव का मतलब जीत या हार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के इस महापर्व में लगातार भागीदारी था। वह शख्स थे भागलपुर के नागरमल बाजोरिया, जिन्हें लोग प्यार से ‘धरती पकड़’ के नाम से जानते थे। दशकों तक चुनावी मैदान में डटे रहने वाले नागरमल बाजोरिया का पटना में निधन हो गया। उन्होंने 97 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। उम्र के अंतिम पड़ाव पर वे वृद्धावस्था से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर मिलते ही सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई। पटना से उनका पार्थिव शरीर भागलपुर लाया गया, जहां बरारी स्थित श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया
जीत नहीं मिली, लेकिन चुनाव लड़ना कभी नहीं छोड़ा
नागरमल बाजोरिया उर्फ धरती पकड़ की पहचान किसी राजनीतिक दल के बड़े नेता के तौर पर नहीं, बल्कि चुनावी मैदान के उस योद्धा के रूप में बनी, जो हार के बाद भी अगली लड़ाई के लिए तैयार रहता था।उन्होंने पंचायत से लेकर विधानसभा, लोकसभा और यहां तक कि राष्ट्रपति पद के चुनाव तक में अपनी किस्मत आजमाई। उनके चुनाव लड़ने की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आते रहे हैं। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक उन्होंने अपने जीवनकाल में 281 से अधिक चुनावों में भागीदारी की। कुछ विवरणों में उनके नाम 284 चुनाव लड़ने का रिकॉर्ड भी बताया जाता है। इनमें कई बार तकनीकी कारणों से उनके नामांकन रद्द भी हुए।लेकिन चुनावी नतीजों ने उनके कदम कभी नहीं रोके। प्रतिद्वंद्वी उन्हें हराते रहे, मगर वह चुनावी मैदान छोड़ने को तैयार नहीं हुए।यही वजह थी कि उन्हें ‘धरती पकड़’ की उपाधि मिली।
इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक को दी चुनौती
नागरमल बाजोरिया का चुनावी सफर सिर्फ स्थानीय चुनावों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने देश की राजनीति के कई बड़े चेहरों के खिलाफ निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ताल ठोकी। उन्होंने उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा सीट से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा। इसके अलावा अमेठी से राजीव गांधी के खिलाफ भी चुनाव मैदान में उतरे।इन हाई-प्रोफाइल मुकाबलों ने उन्हें देशभर में सुर्खियों में ला दिया। उस दौर में जब बड़े नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ना ही अपने आप में बड़ी खबर होती थी, बाजोरिया बार-बार ऐसे मुकाबलों में उतरते रहे
राष्ट्रपति पद तक पहुंची ‘धरती पकड़’ की चुनावी जिद
उनकी चुनावी कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ा है। बताया जाता है कि 1969 के ऐतिहासिक राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने वी.वी. गिरि के खिलाफ नामांकन दाखिल कर पहली बार राष्ट्रपति पद की चुनावी यात्रा शुरू की थी।इसके कई दशक बाद उन्होंने एक बार फिर राष्ट्रपति पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की। 2012 में यूपीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के खिलाफ उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया। हालांकि उनका नामांकन बाद में तकनीकी कारणों से रद्द हो गया।यानी जिस शख्स ने पंचायत से चुनावी सफर शुरू किया, उसकी राजनीतिक यात्रा देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने की कोशिश तक गई।
93 की उम्र में भी तीन लोकसभा सीटों पर नजर
नागरमल बाजोरिया की जिद और जीवटता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उम्र के 90 के दशक में पहुंचने के बाद भी उनका चुनावी जोश कम नहीं हुआ। 93 वर्ष की उम्र में उन्होंने एक साथ तीन लोकसभा सीटों—पुरानी दिल्ली, रायबरेली और पटना साहिब—से चुनाव लड़ने का फैसला किया था।उनके लिए चुनाव महज सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं था। वह इसे लोकतंत्र में आम आदमी की भागीदारी के रूप में देखते थे।
1930 में लाहौर से भागलपुर आया था परिवार
नागरमल बाजोरिया और उनका परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के लाहौर से जुड़ा था। वर्ष 1930 के आसपास उनका परिवार लाहौर से भागलपुर आकर बस गया था। इसके बाद भागलपुर ही उनकी कर्मभूमि बन गया।एमपी द्विवेदी मार्ग के निवासी नागरमल बाजोरिया लंबे समय तक शहर की सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। फिलहाल वे अपने बेटे के साथ रहा करते थे।
चुनाव के बाद समाजसेवा को बनाया अपना मिशन
‘धरती पकड़’ की कहानी को केवल चुनाव और हार-जीत तक सीमित कर देना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। चुनावी राजनीति से दूरी बनाने के बाद उन्होंने अपना काफी समय समाजसेवा, गरीब बेटियों की शादी, बच्चों की शिक्षा और जरूरतमंद परिवारों की मदद में लगाया।नबताया जाता है कि इलाके में पेयजल की समस्या को देखते हुए उन्होंने निजी खर्च से नलकूप भी लगवाए थे।यानी जिस व्यक्ति ने जीवनभर चुनावी मैदान में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, उसने बाद के वर्षों में समाज के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।
हारते रहे, लेकिन हार नहीं मानी
नागरमल बाजोरिया की जिंदगी का सबसे बड़ा संदेश शायद यही था कि चुनाव हारना और जिंदगी में हार मान लेना दो अलग बातें हैं। उन्हें चुनाव में वह सफलता कभी नहीं मिली, जिसके लिए अधिकांश उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं। लेकिन हर चुनाव के बाद वह फिर खड़े हुए और अगली चुनौती के लिए तैयार रहे।उनकी चुनावी यात्रा में हार की संख्या भले ही बड़ी रही हो, लेकिन लोकतंत्र में भागीदारी का उनका जज्बा उससे कहीं बड़ा था।उनके नाम को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज होने से भी जोड़ा जाता रहा है और उन्हें देश के सबसे अधिक चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों में गिना जाता है।आज ‘धरती पकड़’ नागरमल बाजोरिया चुनावी मैदान में नहीं हैं। लेकिन उनकी कहानी इस सवाल के साथ हमेशा याद की जाएगी—आखिर ऐसा क्या था, जो एक इंसान को बार-बार हारने के बाद भी चुनावी मैदान में वापस खींच लाता था?शायद जवाब यही है—उन्हें जीत से ज्यादा चुनाव लड़ने और लोकतंत्र में अपनी आवाज दर्ज कराने का जुनून था। और यही जुनून उन्हें आम उम्मीदवारों से अलग कर ‘धरती पकड़’ नागरमल बाजोरिया बना गया।



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