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गुरु अर्जुन देव जी धर्म रक्षक और मानवता के सच्चे सेवक थे

Nalanda news
नालंदा से मृत्युंजय कुमार की रिपोर्ट
र्श्री गुरुनानक देव शाही संगत मोगाल कुआँ में स्थित गुरुद्वारे में श्री गुरु अर्जुन देवजी का शहीदी दिवस मनाया गया। कोरोना संक्रमण के चलते शहीदी दिवस सादगी से मनाया गया। इस दौरान गुरुद्वारे में छबील व लंगर लगाया गया। साथ ही अखंड पाठ साहिब भोग पढ़ा गया। इसके अलावा कथा व कीर्तन द्वारा गुरुवाणी का व्याख्यान किया गया। भाई रवि सिंह ग्रंथी ने बताया कि कोरोना संक्रमण को ध्यान में रखते हुए शहीदी दिवस कोविड नियमों का पालन करते हुए सादगी के साथ मनाया गया। पिछले वर्षों में यह दिवस धूमधाम के साथ मनाया जाता था। बीते वर्ष से कोरोना संक्रमण के चलते यह कार्यक्रम सादगी से मनाया जा रहा है।मोगाल कुआँ गुरुद्वारा में भाई रवि सिंह ग्रंथी के द्वारा शबद कीर्तन भी किया गया। संगत की ओर से ठंडे मीठे पानी,चना व कड़ा प्रसादी (हलुआ) वितरण किया गया। उपस्थित सिख रागियों ने शबद गायन के साथ संगत को निहाल किया। सरदार वीर सिंह ने भी गुरुबाणी के शब्दों का सुंदर कीर्तन कर उपस्थित संगत को भक्ति भाव में डूबो दिया
मौके पर शंखनाद के सचिव समाजसेवी राकेश बिहारी शर्मा ने अपने सम्बोधन में कहा कि गुरु अर्जुन देव जी धर्म रक्षक और मानवता के सच्चे सेवक थे और उनके मन में सभी धर्मों के लिए सम्मान था। शहीदों के 'सरताज' कहे जाने वाले वीर योद्धा श्रीगुरु अर्जुन देव जी का आज शहीदी दिवस मनाया जा रहा है। मुगल बादशाह जहांगीर ने उनकी जघन्य तरीके से यातना देकर हत्या करवा दी थी। इसी कारण हर साल आज ही के दिन उनका शहीदी दिवस मनाया जाता है। वे सिखों के पांचवें गुरु थे। उन्होंने अपना जीवन धर्म और लोगों की सेवा में बलिदान कर दिया। वे दिन रात संगत और सेवा में लगे रहते थे। वे सभी धर्मों को एक समान दृष्टि से देखते थे। गुरु अर्जुन देव जी की अमर गाथा आज भी पंजाब के हर घर में सुनाई जाती है। उनका जन्म 15 अप्रैल, 1563 को गोइंदवाल साहिब में हुआ था। उनके पिता गुरु राम दास थे, जो सिखों के चौथे गुरु थे और माता का नाम बीवी भानी था। गुरु अर्जुन देव बचपन से ही धर्म-कर्म में रुचि लेते थे। उन्हें अध्यात्म से भी काफी लगाव था और समाज सेवा को अपना सबसे बड़ा धर्म और कर्म मानते थे। सिर्फ 16 साल की उम्र में ही उनका विवाह माता गंगा से हो गया था। वहीं, 1582 में उन्हें सिखों के चौथे गुरु रामदास ने अर्जुन देव जी को अपने स्थान पर पांचवें गुरु के रूप में नियुक्त किया था
इस अवसर पर साहित्यिक मंडली शंखनाद के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह ने कहा कि गुरु जी ने जात-पात, रंगभेद, नस्ल का अंतर समाप्त करते हुए एकता का संदेश दिया। अर्जुन देव को साहित्य से भी अगाध स्नेह था। ये संस्कृत और स्थानीय भाषाओं के प्रकांड पंडित थे। इन्होंने कई गुरुवाणी की रचनाएं कीं, जो आदिग्रन्थ में संकलित हैं। इनकी रचनाओं को आज भी लोग गुनगुनाते हैं और गुरुद्वारे में कीर्तन किया जाता है।
भाई रवि सिंह ग्रंथी ने कहा कि श्री गुरु अर्जुन देव जी महराज के इस शहीदी दिवस को याद करके इस गुरु पर्व पर हम लोग इस भीषण गर्मी में लोगों को राहत देने के लिए शीतल जल और छबील प्रसाद का वितरण कर रहे हैं। गुरु महराज के त्याग और बलिदान को सिक्ख समाज कभी नहीं भुला सकता। उन्होंने बतायाकि श्रीगुरु अर्जुन देव जी ने गुरुग्रंथ साहिब का संपादन किया, जो मानव जाति को सबसे बड़ी देन है। संपूर्ण मानवता में धार्मिक सौहार्द पैदा करने के लिए अपने पूर्ववर्ती गुरुओं की वाणी को जगह-जगह से एकत्र कर उसे धार्मिक ग्रंथ में बांटकर परिष्कृत किया। अपने जीवन काल में गुरुजी ने धर्म के नाम पर आडंबरों और अंधविश्वास पर कड़ा प्रहार किया। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है
शंखनाद के मीडिया प्रभारी नवनीत कृष्ण ने कहा कि राष्ट्र तथा धर्म के लिए सब कुछ न्यौछावर कर देने वाले, सिखों के पांचवें गुरु श्री अर्जन देव जी के बलिदान कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। गुरु अर्जुन देव का पूरा जीवन मानव सेवा को समर्पित रहा है। वे दया और करुणा के सागर थे। वे समाज के हर समुदाय और वर्ग को समान भाव से देखते थे।इस अवसर पर सरदार वीर सिंह, सतनाम सिंह, रघुवंश सिंह, रिंकू कौर, दीप सिंह, नैनखि कुमारी, एकामनी कौर, संजू कौर सहित कई लोग मौजूद थे।

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