कभी दार्जिलिंग जाने वाले यात्रियों का सबसे अहम पड़ाव रहा बिहार के किशनगंज जिले का ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन अब एक बार फिर अपनी ऐतिहासिक पहचान वापस पाने की ओर बढ़ रहा है। ब्रिटिश काल में यह स्टेशन मैदानी इलाकों और दार्जिलिंग की पहाड़ियों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी था। अब 'अमृत भारत स्टेशन योजना' के तहत तैयार किए गए मास्टर प्लान ने संकेत दे दिया है कि आने वाले वर्षों में ठाकुरगंज केवल एक रेलवे स्टेशन नहीं, बल्कि सीमांचल और उत्तर-पूर्व भारत का एक बड़ा रेलवे जंक्शन बनने जा रहा है।
रेलवे की इस महत्वाकांक्षी योजना में अतिरिक्त रेलवे ट्रैक, नए प्लेटफॉर्म, डबल लाइन और नई रेल लाइनों का निर्माण शामिल है, जिससे ठाकुरगंज की परिचालन क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। इससे यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिलने के साथ-साथ मालगाड़ियों की आवाजाही भी अधिक सुगम होगी।
213 किलोमीटर का नया रेल नेटवर्क बदलेगा सीमांचल की तस्वीर
ठाकुरगंज को केंद्र में रखकर लगभग 213 किलोमीटर लंबे रेल नेटवर्क का विकास प्रस्तावित है। इसमें कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं शामिल हैं।
111 किलोमीटर लंबे ठाकुरगंज–अररिया रेलखंड के दोहरीकरण का तकनीकी सर्वे पूरा हो चुका है।
56 किलोमीटर लंबे ठाकुरगंज–सिलीगुड़ी रेलखंड के डबल लाइन प्रोजेक्ट को रेलवे बोर्ड से मंजूरी मिल चुकी है।
19 किलोमीटर लंबे ठाकुरगंज–अलुआबाड़ी रोड रेलखंड के दोहरीकरण को भी हरी झंडी मिल चुकी है।
लगभग 27 किलोमीटर लंबी ठाकुरगंज–चतरहाट नई रेल लाइन प्रस्तावित है।
इन सभी परियोजनाओं के पूरा होने के बाद ठाकुरगंज उत्तर बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर-पूर्व भारत के बीच एक महत्वपूर्ण रेलवे जंक्शन के रूप में विकसित होगा।
चिकन नेक कॉरिडोर में बनेगी नई ब्रॉडगेज लाइन
देश की सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण चिकन नेक कॉरिडोर में भी रेलवे बड़ा निवेश कर रहा है। ठाकुरगंज से चटेरहाट (रंगापानी–धूमडांगी) के बीच 24.40 किलोमीटर लंबी नई ब्रॉडगेज रेल लाइन के लिए फाइनल लोकेशन सर्वे शुरू हो चुका है।
यह रेल लाइन उत्तर-पूर्व भारत तक रेल संपर्क को और मजबूत बनाएगी तथा भविष्य में रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण साबित होगी।
जलालगढ़ से किशनगंज तक नई रेल लाइन का भी प्रस्ताव
रेलवे की एक अन्य महत्वपूर्ण योजना जलालगढ़–किशनगंज नई रेल लाइन है, जो दोमुहाना, भेड़ना, मजगामा, पठान टोली और बाभन टोली होते हुए पश्चिम बंगाल सीमा से सटे कानकी स्टेशन तक जाएगी। इस परियोजना से सीमांचल के कई ग्रामीण इलाकों को पहली बार बेहतर रेल संपर्क मिलेगा।
कम होगा मौजूदा रेल मार्गों पर दबाव
फिलहाल इस क्षेत्र में तीन प्रमुख रेल कॉरिडोर संचालित हैं—
कटिहार–किशनगंज–अलुआबाड़ी रोड–चटेरहाट–न्यू जलपाईगुड़ी
कटिहार–किशनगंज–अलुआबाड़ी रोड–ठाकुरगंज–सिलीगुड़ी
कटिहार–अररिया–ठाकुरगंज–गलगलिया–सिलीगुड़ी
नई रेल लाइनों और डबल लाइन बनने के बाद ट्रेनों का संचालन अधिक सुचारु होगा, ट्रैफिक का दबाव कम होगा और उत्तर-पूर्व भारत की ओर जाने वाली ट्रेनों को वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध होगा।
ब्रिटिश काल में था दार्जिलिंग जाने का सबसे बड़ा पड़ाव
ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन का इतिहास भी बेहद गौरवशाली रहा है। ब्रिटिश शासन के दौरान दार्जिलिंग अंग्रेजों का प्रमुख हिल स्टेशन और विश्व प्रसिद्ध चाय उद्योग का केंद्र था। उस समय बिहार और उत्तर भारत से दार्जिलिंग जाने वाले यात्रियों को ठाकुरगंज स्टेशन पर ट्रेन बदलनी पड़ती थी।
यहीं से यात्री दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और अवध-तिरहुत रेलवे के नेटवर्क से जुड़ते थे। इस कारण ठाकुरगंज केवल एक स्टेशन नहीं, बल्कि मैदानी क्षेत्रों और पहाड़ी इलाकों के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क केंद्र था।
फिर लौट सकती है ठाकुरगंज की पुरानी पहचान
रेलवे विशेषज्ञों का मानना है कि प्रस्तावित परियोजनाओं के पूरा होने के बाद ठाकुरगंज एक बार फिर अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभा सकता है। भविष्य में सिलीगुड़ी और उत्तर-पूर्व भारत से आने वाली कई ट्रेनें ठाकुरगंज–अररिया–फारबिसगंज–ललितग्राम मार्ग से संचालित हो सकती हैं, जबकि कुछ ट्रेनों का संचालन वर्तमान कटिहार मार्ग से जारी रहेगा।इससे रेल परिचालन अधिक लचीला होगा, ट्रेनों की संख्या बढ़ेगी और यात्रियों को नए विकल्प मिलेंगे।
सीमांचल के विकास को मिलेगी नई रफ्तार
ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन का विस्तार केवल रेलवे परियोजना नहीं बल्कि सीमांचल के आर्थिक विकास की नई आधारशिला माना जा रहा है। बेहतर रेल संपर्क से व्यापार, पर्यटन, कृषि उत्पादों की ढुलाई, रोजगार और निवेश के नए अवसर पैदा होंगे। साथ ही उत्तर-पूर्व भारत और बिहार के बीच संपर्क पहले से कहीं अधिक मजबूत होगा।
यदि सभी प्रस्तावित परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं, तो आने वाले वर्षों में ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन सीमांचल का सबसे महत्वपूर्ण रेल जंक्शन बनकर उभर सकता है और एक बार फिर इतिहास में अपनी पुरानी पहचान हासिल कर सकता है।

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