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एक महीना बीता, बेटा लापता… माँ की चीखें बेअसर

कम से कम एक बार मेरे बेटे से बात तो करवा दीजिए साहब…” — यह गुहार है तरौनी वार्ड नंबर-5 की रहने वाली 40 वर्षीय मजदूर महिला दुखनी देवी की, जिनका 18 वर्षीय पुत्र नीरज कुमार बीते एक महीने से रहस्यमय ढंग से लापता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने गंभीर मामले में भी धमदाहा थाना पुलिस अब तक सिर्फ बहानेबाज़ी और औपचारिकता तक ही सीमित दिख रही है।
पीड़िता दुखनी देवी ने अपने लिखित आवेदन और फर्द बयान में बताया है कि वह कुछ समय से जालंधर (पंजाब) में रह रही थीं। इसी दौरान उनके पड़ोसी कन्ना मुनि (पिता–जोगेंद्र मुनि), उसके दामाद गोपाल मुनि तथा उसके पुत्र अमित कुमार और सुमित कुमार ने मिलकर पहले से “फैसला” करके उनके दोनों पुत्रों नीरज कुमार और धीरज कुमार (दोनों 18 वर्ष) को अच्छी नौकरी और अच्छे पैसे का लालच देकर अपने साथ ले गए।
दुखनी देवी के अनुसार, 10 दिसंबर 2025 को तीनों आरोपी दोनों लड़कों को तमिलनाडु ले गए, जहां उन्हें गौतमी सुनीता देवी (पति–नजीर मुनि) के पास छोड़ा गया। शुरू में फोन पर बातचीत होती रही, लेकिन 28 दिसंबर 2025 के बाद अचानक नीरज कुमार का मोबाइल बंद हो गया। उसी दिन से वह लापता है।
मामले में और भी चौंकाने वाली बात यह है कि नीरज के साथ गया चंदन मुनि वापस घर लौट आया, बाद में धीरज कुमार भी सुरक्षित घर आ गया, लेकिन नीरज कुमार का अब तक कोई अता-पता नहीं। वहीं आरोपी गोपाल मुनि और कन्ना मुनि भी घर लौट चुके हैं, बावजूद इसके पुलिस ने उनसे कोई सख़्त पूछताछ तक नहीं की।
पीड़िता का कहना है कि जालंधर में काम के दौरान ठेकेदार और नीरज के बीच पैसे को लेकर विवाद हुआ। ठेकेदार ने कहा कि “हिसाब करने के बाद ही पैसा निकलेगा।” इसके बाद हालात बिगड़े। बेटे को सुरक्षित घर बुलाने के लिए दुखनी देवी ने कर्ज लेकर पैसे ट्रांसफर किए, लेकिन उसी शाम से नीरज का मोबाइल बंद हो गया। तब से आज तक एक महीना बीत चुका है।
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि 28 जनवरी 2026 को धमदाहा थाना में लिखित आवेदन देने के बाद भी 8 दिन बीत चुके हैं, लेकिन न तो कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही नीरज का कोई सुराग मिला। आवेदन के दिन सिर्फ डायल 112 की गाड़ी शाम में पहुंची, औपचारिक पूछताछ कर चली गई। उसके बाद मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
परिवार का आरोप है कि जब भी वे थाना जाकर जानकारी मांगते हैं, तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया जाता है कि
“अभी परीक्षा चल रही है, पुलिसकर्मी व्यस्त हैं, अभी कुछ नहीं हो सकता।
क्या गरीब की चिंता परीक्षा से छोटी है? क्या एक युवक की जान की कीमत सिर्फ एक आवेदन तक सीमित है?
नीरज कुमार परिवार का इकलौता कमाऊ सदस्य था। उसके पिता अपाहिज हैं और मां मजदूरी कर जैसे-तैसे घर चला रही हैं। बेटे के लापता होने के बाद से दुखनी देवी का रो-रोकर बुरा हाल है। वह बार-बार सिर्फ एक ही बात कहती हैं—
“मेरा बेटा ज़िंदा है या नहीं, कम से कम ये तो बता दीजिए।”
सवाल यह है कि जब आरोपी घर लौट चुके हैं, मोबाइल नंबर तक उपलब्ध हैं, तो फिर पुलिस की कार्रवाई क्यों शून्य है?
क्या धमदाहा थाना किसी अनहोनी का इंतज़ार कर रहा है?
या फिर गरीब मजदूर की फरियाद सिस्टम में सुनाई ही नहीं देती?
अब इस मामले को लेकर क्षेत्र में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। लोगों का कहना है कि अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन किया जाएगा। जरूरत है कि जिला प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करें, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो और नीरज कुमार को जल्द से जल्द बरामद किया जाए।
वरना यह मामला सिर्फ एक युवक की गुमशुदगी नहीं, बल्कि पुलिस की नाकामी और संवेदनहीन सिस्टम का आईना बनकर रह जाएगा।

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