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डॉ0 लक्ष्मी नारायण सुधांशु जी जयंती विशेष

पूर्णियां से बालमुकुन्द यादव की रिपोर्ट

पूर्णियां : बिहार प्रांत के पूर्णिया जिला अंतर्गत पूर्णिया शहर से पश्चिम दक्षिण दिशा में है लगभग 25 किलोमीटर पर स्थित चंदवा गांव है । ठाकुर धनपत सिंह इसी गांव के जमींदार थे । उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां थी जेष्ठ पुत्र बाबू सहदेव सिंह दूसरे पुत्र मेरे पूज्य फूफा जी डॉक्टर लक्ष्मीनारायण सुधांशु जी थे जितना बड़ा नाम उतना ही बड़ा काम समाज की सोच को अपनी सांस को अपनी सांस समझकर जतन करने वाला व्यक्ति लक्ष्मीनारायण सुधांशु कहलाता था  । महान बलिदानी महात्मा गांधी के आह्वान पर देश के स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने वाले निस्वार्थ स्वतंत्रता सेनानी डॉक्टर लक्ष्मी नारायण सुधांशु जी महान राजनीतिक संत थे ।जिन्होंने आजादी का आंदोलन जीतने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी । अध्ययन चिंतन और अध्यापन के क्षेत्र में सुधांशु जी शुक्ल परंपरा की एक सबल कड़ी थे । साहित्य और राजनीति का मणिकांचन संयोग ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि वह साहित्य को छोड़कर राजनीतिक में आ गए थे  । बल्कि इस बात को यूं समझा जा सकता है कि स्वयं हिंदी साहित्य राजनीति को अपनी ओर मोड़ने हेतु इसके व्रत में आ गए थे


 राजनीतिक ने लोहिया के बाद में उन्हें अफसोस में हुआ उन्होंने बड़े दुख के साथ इसे लिखा है मैं अनुभव करता हूं कि मुझसे अपराध हो रहा है साहित्य सेवा मुझ पर अनिच्छा से लदी नहीं मैंने स्वयं इसे निमंत्रित किया है ।  सेवक बनने का दावा किया है कभी-कभी ऐसी लाचारी होती है कि अपने ही ऊपर खींच हो जाती है करूं तो क्या करूं तो किसको राजनीतिक ने उनके जीवन में ऐसी व्यवस्था ला दी कि वे स्वाध्याय मनन गहरे चिंतन का समय नहीं मिल सका उनके हृदय की आंतरिक बेदी पर साहित्य अधिष्ठाता तो है । पर कृतियों को जितनी वे भेंटे  दे सकते थे । नहीं दे पाए यह एक राष्ट्रीय क्षति है ।  बाद में तो वे कुछ लिखने से भागते रहे और डिक्टेशन देना ज्यादा पसंद करते । हिंदी के वह कैसे हिमायती थे । कि जब अंग्रेजी नाम पटों को हटाने का आंदोलन शुरू हुआ तो अन्य सहयोगियों के साथ एक हाथ में कूची और दूसरे हाथ में अलकतरा का बाल्टी में लेकर पटना की सड़कों पर निकल पड़े और अंग्रेजी नाम  पर कालिख पोतने लगे । केवल आशीर्वाद दें अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर दी वरन अपनी मासिक पत्रिका अवंतिका के संपादकीय अग्रलेख में आप भारत सरकार शिक्षा मंत्रालय और शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद की हिंदी विरोधी नीति की कड़ी से कड़ी आलोचना किया करते थे । साधारण सदस्य की बात कौन कहे के0बी0 सहाय जैसे दबंग मुख्यमंत्री को अंग्रेजी में बजट पेश करने की अनुमति सुधांशु जी ने नहीं दी थी ।  राज्यपाल के अंग्रेजी में आए आमंत्रण को अस्वीकार दिया । सारे भारत में सुधांशु जी की ख्याति  थी । सुधांशु जी मनसा वाचा कर्मणा से आयी संचिका पर मेरा हस्ताक्षर नहीं होगा और ना हिंदी के अतिरिक्त किसी भाषा में आए पत्रिका मेरे कार्यालय से उत्तर नहीं जाएगा यह मेरा आदेश है। यह सुन सभी सकते में आ गए हमारे यहां टंकण का आभाव है , किसी ने कहा तो हाथ से काम कीजिए पर सभी काम हिंदी में होंगे यह चेतावनी दे सुधांशु जी उठ खड़े हुए। विधानसभा का संपूर्ण काम हिंदी में होने लगा सुधांशु जी अपनी निष्पक्षता न्याय प्रियता और आत्मा के प्रति बुद्ध के सुविचार उन पर कितना भी दबाव क्यों ना हो डाला जाए वे दृढ़ता से अड़े रहते थे । यह सब हिंदी प्रेमियों के लिए गौरव की बात थी । साहित्य कला भाषा शास्त्र राजनीतिक अर्थशास्त्र दर्शन शास्त्र और समाजशास्त्र के वे एक प्रौढ़ एवं गंभीर विद्वान थे । उनके लेखन शैली जितनी गंभीर है उनकी भाषा शैली उतनी ही सरल है उनके शब्द अपने अर्थों को स्वयं ही राह दिखाते हैं और उनके वाक्य विचार चिंतन की मूर्तिमय में कर देते हैं । वे नपी तुली और सुधि ही भाषा बोलते थे । अल्प में बहुत 


" जीवन के तत्व और चांद के सिद्धांत" नामक उनकी प्रसिद्ध आलोचना पुस्तक को अधिकतर भाग डिक्टेशन देकर कराया गया मैं अक्सर यह सोचती हूं कि जिनकी डिक्टेशन की हुई पुस्तक में इतनी गंभीरता है उनकी स्वयं अपने हाथ से लिखी पुस्तक में कितनी गहनता होगी हिंदी साहित्य के लिए यह दुर्भाग्य ही रहा सुधांशु जी अपना संपूर्ण गंभीर चेतन लेखन में नहीं उतार सके इसका प्रमुख कारण यह रहा कि उनके प्रौढ़ काल का अधिक समय बिहार के इसका ज्वलंत प्रमाण सर्वविदित है देश प्रेम ही सर्वोपरि था राजनीतिक कि कलुष-कलिमा उन्हें छू तक नहीं गई थी राजनीति के क्षेत्र में ऐसे संत विरले होते हैं सुधांशु जी उन्हीं विरले चंद व्यक्तियों में एक थे वह किसी पद के लिए कभी ललायित नहीं रहे बल्कि किसी पद पर जाकर उन्होंने उस पद की महत्ता बढ़ाया । बिहार विधानसभा के अध्यक्ष पद स्वीकार कर उन्होंने अध्यक्ष पद की गौरव गरिमा को बढ़ाया अपने अध्यक्ष पद से उन्होंने जो नए कार्य आरंभ किए वह सारे देश के लिए आदर्श बन गए और तभी तो उस समय "सर्च लाइट" के संपादक को अपनी संपादकीय अग्रलेख में सुना पड़ा सुधांशु की एक्ट्रेस हिस्ट्री सुधांशु ने इतिहास रचा वे किसी दल विशेष के कृतज्ञ नहीं थे बल्कि अध्यक्ष पद स्वीकार करके उन्होंने विधानसभा को कृतज्ञ किया । यह वह समय था जब अपने त्याग और बलिदान से लाभ उठाने की कल्पना तक कोई नहीं करता था देश प्रेम ही सर्वोपरि था आज बिहार विधानसभा में शत-प्रतिशत काम हिंदी में होता है जिसका श्रेय बिहार के टंडन, दृढ़व्रती और अपने विचार पर अडिग रहने वाले सुधांशु जी की है । जिस दिन से वे विधानसभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए उसी दिन विधानअध्यक्षों को अपने कक्ष में बुलाकर कहा कल से हमारे सचिवालय का सारा काम हिंदी में होगा । इसके अतिरिक्त किसी अन्य भाषा के बारे में नहीं सोचोगे तो हमें प्रकाश मिलेगा और हम अपने को पहचान सकेंगे और महापुरुषों के जीवन से कुछ सीख सकेंगे सूरत शक्ल सबकी एक होने पर जैसा किसी ने कहा आदमी को मयस्सर नहीं है 


इंसा होना हर आदमी को इंसान होना मयस्सर नहीं होता ।आज इन महापुरुषों के जीवन पर गौर करें उतने बड़े मेधावी  हम नहीं बन सकते प्रयत्नतो कर सकते हैं आज हमारे पीढ़ी के लोग हमारे बाद के पीढ़ी के लोग अधिकांश लोग आदमी के सूरत वाले हैं लेकिन इंसान नहीं रह गए पर किसी ने और उनके दृष्टिकोण ने आदमी को पैदा होने के बाद भी हमको और हमारे देश  के अधिकांश लोगों को हैवान बना दिया है । परिस्थिति ने और उनके अपने अभ्यास ने इस बात की नितांत आवश्यकता है कि सुधांशु जी मे जो जो आदमीयता थी ।  जो उच्चता थी उस मनुष्यता को हम उजागर करें उनके भीतर जो आदमी था उस आदमी का अनुसरण करने कि की चेष्टा करें इसलिए आज मैं समझता हूं कि सुधांशु के जीवन का अध्ययन करके उनके जीवन के उनके गुण के एक अंश को भी उतारने की चेष्टा करें आज हमारे देश में पशुता हावी  हो गई है मानवता पर जीवन के हर पक्ष में पशुता हावी हो गई है । यह नितांत आवश्यकता है कि मानवता के गुणों के प्रति आदर की जाए और दृष्टि से बहुत ही आदर्श से हमारे सुधांशु जी प्रकार से सतत रहे हैं सिर्फ कहते ही रहे हो या नहीं यहां जो बात उनके वश की रही किया भी सुधांशु जी कलाकार थे नेता थे सबकुछ से इसके अलावा सबसे बड़ी चीज वह थी कि वह समग्र मानव थे अपनी संपूर्णता में वे मानव से मानव जो संपूर्ण होता है दुनिया की कोई ताकत से बढ़कर नहीं होती है सुधांशु जी की जो प्रतिमा थी जो गुण था । ऐसे गुण महापुरुषों में ईश्वर भर देता है वह हमारे और आपके बस की बात नहीं है ऐसे महापुरुषों के बारे में कवि सियारामशरण गुप्त जी का है " पद पूजन का भी क्या उपाय ,गौरव गिरी उतुंग काय 

 वैसे महापुरुषों की महानताओं की अनुभव करने में असमर्थ हूं । हम तो उसके चरणों के पास तक नहीं पहुंच सकते हम उन महापुरुषों का अनुकरण क्या करेंगे महापुरुषों के कुछ गुण एसे होते हैं । लेकिन उस प्रतिमा के अतिरिक्त सुधांशु जी ने कुछ हासिल किया अपने जीवन में वह हमारे और आपके बस की बात नहीं है अपने अभ्यास से प्रयोग से अपने व्यवहार से अपने आदर्श से अपने चाल चलन से हासिल किया उन गुणों को हम और आप हासिल कर सकते हैं हमारे देश के प्रतिष्ठित राजनीतिक जीवन में सामूहिक जीवन में परिवारिक जीवन में हर जगह आदमी आज हैवान हो चला है । भगवान ने हमें सूरत और शक्ल दिया है लेकिन सूरत और शक्ल के भीतर आदमी है या जानवर  सोचने की चेष्टा करनी चाहिए अगर थोड़ा सा हम और आप अंतर्मुखी होंगे और थोड़ा हम अपने नौजवानों को चाहिए '  स्व ' को थोड़ा पीछे रख कर समाज को आगे लाने की चेष्टा करें और देखा करें खुद अपनी नजर में जो काम हम कर रहे हैं वह सही है कि नहीं खुद अपनी नजर में तटस्थ होकर देखें और सोचे आदमी के भीतर एक ऐसी शक्ति है जो सबके भीतर है जब कोई गलत करता है तो उसके भीतर अंकुश की तरह टीस की तरह रोकती है लेकिन मनुष्य उस टीस अंकुश की परवाह ना कर गलत कदम बढ़ाता है । गलत कदम बढ़ाने के पहले जो टीस होती है उस चीज को सुनने की चेष्टा करें ।सुधांशु जी के जन्म दिवस पर हम सब कोई स्मारक ना बना सकेंगे सिर्फ यह निर्णय करें कि हमारे भीतर जो हैवानियत है जो जानवर पनप रहा है , उसे खोज कर कर हम बाहर निकाल लेंगें तो सुधांशु जी के प्रति बड़ी सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।डॉ0 लक्ष्मी नारायण सुधांशु की भतीजी- डॉक्टर सुनंदा सिंह की कलम से पता- चंदवा रूपसपुर

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