नामी अल्ट्रासाउंड सेंटर की एक रिपोर्ट ने मरीज को पहुंचा दिया मौत के मुहाने पर! पति का आरोप- पत्नी की जान बचाने के लिए दूसरे डॉक्टर के पास भागना पड़ा, बोले- नाम बड़े, दर्शन छोटे
पूर्णियाँ /बालमुकुन्द यादव
पूर्णिया। बड़े नाम और भरोसे के साथ इलाज की उम्मीद लेकर मरीज किसी बड़े डायग्नोस्टिक सेंटर पहुंचता है, लेकिन अगर जांच रिपोर्ट ही बीमारी की सही तस्वीर सामने न रख सके तो मरीज की जिंदगी पर संकट खड़ा हो सकता है। पूर्णिया के चर्चित ईशान डायग्नोस्टिक इमेजिंग सेंटर से जुड़ा करीब 13 साल पुराना एक ऐसा ही मामला सामने आया है, जिसमें एक महिला मरीज के पति ने अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाए हैं। पति का आरोप है कि सेंटर की रिपोर्ट में वास्तविक बीमारी का पता नहीं चलने के कारण उनकी पत्नी की हालत इतनी बिगड़ गई कि वह मौत के मुहाने पर पहुंच गई थीं। बाद में दूसरे डॉक्टर से अल्ट्रासाउंड कराने पर बीमारी का पता चला और ऑपरेशन संभव हो सका। अब इस मामले में सेंटर से जुड़े तीन डॉक्टरों को जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में अपना पक्ष रखना पड़ा है।मरीज के पति नीरज सिंह का दर्द और नाराजगी इस पूरे मामले को और गंभीर बना देती है। उनका कहना है कि पूर्णिया में ईशान अल्ट्रासाउंड का नाम और प्रतिष्ठा सुनकर वे अपनी पत्नी अनुपम कुमारी को जांच के लिए वहां ले गए थे। उन्हें उम्मीद थी कि नामी सेंटर में जांच कराने से बीमारी की सही जानकारी मिलेगी और समय पर इलाज हो सकेगा। लेकिन वहां से मिली रिपोर्ट में उनकी पत्नी की वास्तविक बीमारी सामने नहीं आई।नीरज सिंह के मुताबिक, इस रिपोर्ट के बाद उनकी पत्नी की स्थिति गंभीर होती चली गई। परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आखिर बीमारी क्या है और मरीज की हालत क्यों बिगड़ रही है। इसके बाद उन्होंने डॉ. ए.के. गुप्ता के यहां दोबारा अल्ट्रासाउंड कराया। नीरज सिंह का दावा है कि वहां जांच में वास्तविक बीमारी का पता चला और फिर ऑपरेशन संभव हो सका। उन्होंने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जिस सेंटर पर भरोसा करके गए थे, उसकी रिपोर्ट ने उन्हें बड़ी मुसीबत में डाल दिया। उनके शब्दों में, 'नाम बड़े, दर्शन छोटे।'
8 अप्रैल 2013 की रिपोर्ट पर उठे गंभीर सवाल
मामले के दस्तावेजों के अनुसार, 8 अप्रैल 2013 को अनुपम कुमारी ने ईशान डायग्नोस्टिक इमेजिंग सेंटर में एक्स-रे केयूबी और पूरे पेट का अल्ट्रासाउंड कराया था। रिपोर्ट में एक्स-रे केयूबी सामान्य बताया गया था। वहीं, पूरे पेट के अल्ट्रासाउंड में पेट की गुहा (पेरिटोनियल कैविटी) में मामूली तरल पदार्थ और अत्यधिक आंतों की गैस की छाया होने का उल्लेख किया गया था।शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसी जांच में उनकी वास्तविक बीमारी की पहचान नहीं हो सकी। बाद में दूसरी जगह अल्ट्रासाउंड कराने पर बड़ी सिस्टिक गांठ का पता चला। इसी कथित अंतर और उससे हुए नुकसान को लेकर मामला उपभोक्ता आयोग पहुंचा।
तीन डॉक्टरों ने बचाव में रखी अपनी दलील, कहा- रिपोर्ट को गलत नहीं माना जा सकता
इस मामले में ईशान डायग्नोस्टिक इमेजिंग सेंटर से जुड़े डॉ. मुकेश कुमार, डॉ. खितिश कुमार और डॉ. संगीता कुमारी अग्रवाल विपक्षी पक्ष हैं। तीनों की ओर से आयोग में दाखिल लिखित जवाब में मेडिकल लापरवाही के आरोपों को खारिज किया गया है।डॉक्टरों की दलील है कि 2013 में जांच के दौरान अल्ट्रासाउंड मशीन पर जो तस्वीरें दिखाई दी थीं, रिपोर्ट उसी के आधार पर तैयार की गई थी। बाद में किसी दूसरी जांच में बड़ी सिस्टिक गांठ मिलने का मतलब यह नहीं है कि पहले की रिपोर्ट में चिकित्सकीय लापरवाही हुई थी।डॉक्टरों ने अपने बचाव में बीमारी की स्थिति में बदलाव, मरीज की शारीरिक परिस्थितियों, इमेजिंग तकनीक, ब्लैडर की स्थिति, आंतों में गैस, मशीन की क्षमता और अलग-अलग रेडियोलॉजिस्ट की व्याख्या में अंतर जैसे कारण गिनाए हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि 2013 में की गई जांच केयूबी क्षेत्र तक सीमित थी, जबकि वह विशेष रूप से पेल्विक या स्त्री रोग संबंधी अल्ट्रासाउंड नहीं था।
डॉक्टरों ने मरीज के परिवार से ही मांगे ऑपरेशन के दस्तावेज
विपक्षी डॉक्टरों ने अपने जवाब में शिकायतकर्ता पर ऑपरेशन से जुड़े महत्वपूर्ण मेडिकल दस्तावेज प्रस्तुत नहीं करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि शिकायत में ऑपरेशन का उल्लेख तो किया गया है, लेकिन ऑपरेशन के दौरान मिले वास्तविक निष्कर्ष, हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट, डिस्चार्ज समरी और अन्य मेडिकल रिकॉर्ड आयोग के सामने नहीं रखे गए हैं।डॉक्टरों ने यह भी दलील दी है कि शिकायतकर्ता ने पहले के अल्ट्रासाउंड की तस्वीरें और किसी योग्य रेडियोलॉजिस्ट या मेडिकल बोर्ड की ऐसी विशेषज्ञ राय पेश नहीं की है, जिससे यह साबित हो सके कि उनकी रिपोर्ट निर्धारित चिकित्सकीय मानकों के विपरीत थी। उनके अनुसार, बाद में दूसरे डॉक्टर की अलग राय आ जाना अपने आप में मेडिकल लापरवाही का प्रमाण नहीं है।
13 साल पुरानी लड़ाई, अब आयोग में डॉक्टरों की दलीलों की परीक्षा
यह मामला जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, पूर्णिया में उपभोक्ता परिवाद संख्या DC/214/CC/10/2019 के रूप में दर्ज है। शिकायतकर्ता अनुपम कुमारी, पति नीरज कुमार सिंह, गुलाबबाग के सिटी रोड की निवासी हैं। आयोग के नोटिस के मुताबिक, 5 जून 2013 को प्रारंभिक सुनवाई के बाद विपक्षी पक्ष को नोटिस जारी करने का आदेश दिया गया था।आयोग के 18 जून 2026 के आदेश के अनुपालन में तीनों डॉक्टरों की ओर से लिखित जवाब दाखिल किया गया है। नोटिस में 28 अक्टूबर 2026 को सुबह 10:30 बजे सुनवाई की तारीख निर्धारित की गई थी।अब इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 2013 की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में वास्तव में कोई चिकित्सकीय चूक हुई थी? क्या दूसरी जांच में सामने आई बीमारी पहली जांच के समय भी मौजूद थी? और क्या उस रिपोर्ट की वजह से मरीज को गंभीर नुकसान पहुंचा? इन सवालों का जवाब मेडिकल साक्ष्यों और विशेषज्ञ राय से ही सामने आ सकेगा। फिलहाल मरीज के पति अपनी पत्नी की जान पर आई आफत के लिए उस रिपोर्ट को जिम्मेदार बता रहे हैं, जबकि तीनों डॉक्टरों ने आरोपों को नकारते हुए अपना बचाव पेश किया है। आयोग का अंतिम फैसला आना अभी बाकी है।

Post a Comment